मेरा मन.
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|   Apr 27, 2017
मेरा मन.

आज जब पापा का फोन आया, तो लगा बाद में बात करूंगी! 

मन ही नही होता ! बस एक "औपचारिकता" रह गई। कब पापा की लाड़ली बेटी से, इतना गैर हो गई याद ही नही आया। शादी को छः साल हो गये, ओर वो बेएतबारी भी नही रही। कभी कभी सोचती हूं, मैं भी तो मां बन गई हूं, कहीं सब पलट कर वापस न आ जाये। मेरी बेटी, जिस पर मैं जान लूटाती हूं वो मुझे ऐसे ही बेगाना कर दे अगर! सोच कर ही मैने उन्हे फोन किया।

 पापा : कैसी हो ? खुशी (मेरी बेटी) कैसी है और जमाई साहब?

मै : (मन मे "जमाई साहब?) ठीक हूं पापा। सब अच्छे है। आप और मम्मी कैसे हो। 

पापा : यहां भी सब अच्छे है। चलो बाद मे बात होती है फिर।

बस ईतना ही है अब मायकै से मेरा रिश्ता। उन्होने पराया कर दिया ओर मैं अब अपना बनाना नही चाहती। 

क्योकि ....  छ: साल पहले मैनै जिन्दगी का एक फैसला खुद ही ले लिया। फिर, उनकी प्यारी बेटी पराई हो गई, और मेरे प्यारे पापा अजनबी हो गये।  मेने यही सोचा...

मन मेरा मन, मन ही था, क्यो दूर कर दिया।

ऐसा तो कुछ न था, जो पल मे पराया कर दिय।

छोटी सी बिटीया, घर बसानें चली,

क्यौ अपनो ने ही दामन, काटों से भर दिया।

मन मेरा मन, मन ही था, क्यो दूर कर दिया।........

पर मैं भी डरती हूं, ओर बस यही चाहती हूं। मैं, वो सब खुशी के लिये जरुर करु, जिसकी उम्मीद मैने मां-पापा से की, और जो मेरी चिडी़या मुझसे करेगी। उसकी हर जायज़ मांग पूरी करना चाहूंगी। ओर एक दिन, वो मूझे वैसे ही आंकेगी ... जैसे मैं अपने मां-पापा को। 

ज्यादा नही हुआ कुछ, पर मन शीशे सा हे शायद, इसलिये दरार यहा भी पड़ गई ओर वहां भी पड़ गई॥॥

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