घूँघट 
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|   Jul 02, 2017
घूँघट 

घूँघट

June 29, 2017

कल एक न्यूज़ देखी जिसमे हरियाणा स्टेट गवर्नमेंट की एक मासिक पत्रिका के कवर पेज़ पर एक फोटो के साथ कैप्शन लिखा था ..."घूँघट की आन बान ..म्हारे हरियाणा की पहचान " जब से ये न्यूज़ देखी है तभी से सोच रही हूँ कोई भी कुप्रथा किसी भी देश या प्रदेश की शान या पहचान कैसे हो सकती है ...वो भी हरियाणा ....जिसका नाम बेटो से ज्यादा वहां की बेटियां रोशन कर रही है ...

गीता .. बबिता ...साक्षी मलिक अगर घूँघट में रहती तो क्या वो कुश्ती लड़ सकती थी ....कल्पना चावला कभी  घूँघट ओढ़ कर चाँद पर जाने की कल्पना भी नही कर सकती थी.........सोचने वाली बात है ...

मैं हरियाणा से नही हूँ पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिस क्षेत्र से हूँ वहां पर हरियाणा की संस्कृति का काफी प्रभाव देखने को मिलता है ...इसीलिए खुद को हरियाणा के काफी नजदीक महसूस करती हूँ ......

पर्दा प्रथा हमारे यहाँ भी थी ....हां मै 'थी' ही कहूंगी क्योंकि अब ये प्रथा धीरे धीरे खत्म हो रही है ... जो एक प्रगतिशील समाज के लिए काफी अच्छी बात है ...

मैं जब भी ससुराल जाती हूँ तो घर मे ना सही पर घर से बाहर बिना घूँघट किये नही निकल सकती ..... तो मैं इस घूँघट लादने (ओढ़ने नही) के दुख से भली भांति परिचित हूँ ....मैं जानती हूं घूँघट में ढंग से सांस भी नही लिया जाता ... तेज़ चलने की तो सोच भी नही सकते ...धीरे धीरे चलने में भी कितनी परेशानी होती है रास्ता ढंग से दिखाई नही देता आपको किसी और पर पूरी तरह से निर्भर होना पड़ता है....

सच कहूँ जब भी घूँघट में होती हूँ तो खुद पर गुस्सा आता है सोचती हूँ क्या यही तेरा आत्मसम्मान है ... जिस प्रथा के तू इतनी खिलाफ है उसी को ढो रही है ... फिर समाज और बड़ो के सम्मान की सोचती हूँ और शांत हो जाती हूँ .... क्योंकि मुझे कभी कभी सिर्फ 2.....4 मिनट के लिए ही घूँघट करना होता है ....घर मे हम पूरी तरह से स्वतंत्र है ... मेरे सास ससुर जी दोनो ही काफी आधुनिक सोच वाले हैं ....तो ये सोच कर मैं वो एक महीने में 2...4 मिनट का घूँघट झेल लेती हूँ ...

पर मैं जब भी घूँघट करती हूँ तो मुझे लगता है के मैं खुद के साथ कुछ गलत कर रही हूँ ...कोई पाप कर रही हूँ पर्दा ना करने का कदम एक औरत को खुद ही उठाना पड़ता है ...कोई सामने से आ कर नही कहेगा के पर्दा करना छोड़ दो .... मेरे पैदा होने के बाद तक भी मेरी मम्मी मेरी दादी के सामने मेरे पापा तक से भी पर्दा करती थी .... जो मम्मी ने खुद ही करना बंद किया जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ा कदम था ....

फिर उन्होंने दादा जी से पर्दा हटाया ...उनका मानना था के जब मैं पिताजी को अपने सगे पिताजी से भी ज्यादा प्यार और सम्मान देती हूं और वो भी मुझे अपनी बेटी से बढ़ कर प्यार करते है तो एक बाप बेटी के बीच कैसा पर्दा ... अगर मैं अपने पिता जी से पर्दा करूँगी तो फिर इनकी सेवा कैसे करूँगी .... और मेरे दादा जी भी उनकी इस बात से बिल्कुल सहमत थे .... तो कहने का मतलब है पहल करनी पड़ती है ... और ये एक औरत की समस्या है तो हल भी उसे खुद ही करना पड़ेगा ....

और अगर पर्दे का इतिहास देखा जाए तो पर्दा कभी भी हमारी संस्कृति का हिस्सा नही था ... हमने कभी किसी देवी को पर्दे में नही देखा .... अगर झांसी की रानी पर्दा करती तो क्या वो अंग्रेजों से लड़ पाती ....

पर्दा प्रथा हमारे देश मे मुगलों के आने के बाद आयी ... वो अपनी औरतों को तो पर्दे में रखते थे और हिन्दू औरत को बुरी निगाहों से देखते थे ... जिस वजह से हिंदुओं ने भी अपनी औरतों का बाहर से आये इन मुगलो से पर्दा कराना शुरू कर दिया .... जो धीरे धीरे एक परंपरा बन गयी औरते अपने घर मे भी पर्दे में रहने लगी .... शायद जो एक पुरुष के अहम को पोषित करने का काम करने लगा और और वो औरत को खुद से कहीं कम आंकने लगा ....उसने इसे औरतों को दबाने और अपनी हुकूमत उस पर चलाने का एक जरिया बना लिया ....

अब समय है इस कुप्रथा के बिल्कुल खत्म होने का ... जो सिर्फ औरत ही कर सकती है ....पर मैने ये भी देखा है .... गाँव में अगर कोई औरत पर्दा नही करती तो आदमी कहे या ना कहे पर दो चार औरते ज़रूर आ जाती है उसे नसीहत देने .... "हाय राम फलाने की बहु को देखा कैसे मुँह उघाड़ कर चल रही थी किसी की कोई शर्म लिहाज़ नही रही सच मे घोर कलयुग है "

और मुझे अफसोस होता है उनकी सोच पर .... शायद वो नही चाहती के जो काम वो नही कर पाई वो कोई और भी करे कभी कोई ससुर बहु को घूँघट डालने के लिए नही बोलता ......हमेशा सास ही बोलती है और तर्क देती है हम भी तो सारा काम घूँघट के साथ ही करते आ रहे है इतने सालों से फिर तू क्यों नही कर सकती .......मतलब उसने जो इतने साल सहा है अब उसका बदला लेने की बारी है ......

जबकि होना उल्टा होना चाहिए था उसे ये समझना चाहिए था के जो कष्ट मैं सह चुकी कम से कम मेरी बहु वो कष्ट ना सहे

....क्योंकि ये बात तो पक्की है घूँघट में कोई खुश रह ही नही सकता ..... अगर कोई औरत इसकी तरफदारी करती है तो वो खुद से ही झूठ बोल रही होती है .....

बदलाव ही समय की मांग है ...

नही तो वो समय भी दूर नही जब हरियाणा के साथ साथ हमारा उत्तर प्रदेश और राजस्थान भी घूँघट को अपनी शान बताने से पीछे नही हटेंगे ....

जय राम जी की 🙏

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