गरीब की ममता
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|   Aug 01, 2017
 गरीब की ममता

मां बाप दोनों ही काम पर जाने के लिए तैयार हैं । माँ ने जल्दी-जल्दी रोटी बनाई और एक कपड़े में बांधकर अपनी टीन की छत से लटके हुए तार में बांध दी । पिता ने अपना गमछा उठाया  और काम पर पहले निकला । पहले निकलना तो हमेशा सुधा को होता है ।आज फिर से लेट हो गई ।  मैडम बहुत डाँटती है । लेट आती हो , तुम्हारे पैसे काट लूँगी ।  शुभू को 4,5 दिन से ही  हल्का बुखार है क्या करें रूक भी नहीं सकती अपने बेटे के पास । मैडम  एक दिन की भी तनख्वा काट ले तो सारा हिसाब गडबड हो जाता है। जाना  बहुत जरुरी है अपने शुभू के माथे को बार-बार चूमते हुए सुधा अपनी खोली से बाहर निकली  ।बड़ा बेटा धनी खोली के बाहर बैठा है उसको इशारा  किया,  छोटे भाई का ध्यान रखना धनी । मैं जा रही हूं। बाहर मत जाना ।मैं दुपहरिया में  आऊंगी  फिर अस्पताल चलेंगे। सुधा के हाथ में सिर्फ नाम रखना  ही था तो अपने बेटे का नाम धनी रख दिया । काश उसके हाथ में  किस्मत की कलम भी होती जिससे वो अपने बेटे का भाग्य भी लिख पाती ।  दौड़ती हुई मां को देखता  धनी ।न जाने कब मां नजरों से ओझल हो गई। । धनी खोली के अंदर आया । अपने भाई शुभू को उठाया ," शुभू उठो । " मां के जाने के बाद 9साल का धनी  मां बन जाता है। जितना  दुलारा माँ करती है उससे कम नहीं करता । उठ जा चीनी की बो......री । सुबह की दवाई का असर है शुभू का बुखार  धीमा पड़ चुका है । धनी ने रोटी की पोटली उतारी और रुखी रोटी का एक टुकड़ा मिर्च के अचार से  खुद खाया और दूसरा शुभू को खिलाया । पास रखे  मटके में से पानी पीकर दोनों की आत्मा जैसे तृप्त हो गई ।  कपड़े के नाम पर धनी के पास एक कच्छा ही है । और शुभू के पास तो वो भी नहीं । शुभू ने अपने भाई धनी से पूछा ,"  आज नहीं चलेंगे ?"  धनी ने कहा ," ना आज तुझे बुखार है ना । आज नहीं चलेंगे । जब तू ठीक हो जाएगा तब चलेंगे ।  नहीं मुझे आज भी जाना है ।मेरा बुखार ठीक है।  ना शुभू मां  जल्दी आएगी ।बोलकर गई है ।  जब तक हम आ जाएंगे । चलो ना , मेरा बड़ा मन है । मां बनने की भरपूर कोशिश के बाद भी धनी बच्चा ही रहा ।  दोनों  निकल पड़े रोज की तरह।  दौड़ते हुए , टूटी-फूटी सड़क में बने हुए गढ्ढों , गढ्ढों  में भरे पानी में कूदते  । खोलियों के  खत्म होते ही आलीशान महलों की कतार लगी है । शुभू ने धीरे से धनी से कहा ," मुझे गुलाब का फूल चाहिए ।" धनी ने चौकीदार से नजर बचाकर लोहे की जाली में अपना हाथ घुसा अपने भाई को गुलाब का फूल तोड़ कर दिया । शुभू बहुत खुश है न जाने कौन सा खजाना मिला है । कभी उसे अपने सर पर लगाता है ।कभी खुशबू सूँघता है ।   महलों की कतार को पार करके दोनों चमचमाती सड़क पर पहुंचे । ये वही जगह है जहां  आकर शुभू और धनी की रफ्तार रुक जाती है ।  कुछ खरीदने के लिए नहीं । ना ही कुछ खरीदने की सोचने के लिए । चमचमाती दुकानों में बिकने वाले सामानों को नजर भर देखने के लिए । वो दोनों  इतनी दूरी तय कर रोज यहाँ आते हैं । शुभू कभी धनी से नहीं कहता कि उसे रंग-बिरंगे कपड़े चाहिए । नहीं कहता कि उसे आइसक्रीम खानी है । नहीं कहता वो जो दुकान के अंदर रखी मोटर गाड़ी है जिसमें  वो लड़की बैठी है उसमें  उसे भी बैठना है ।दोनों  दुकान  के बाहर  खड़े होकर झांककर  देखना चाहते हैं । चौकीदार कभी-कभी मारकर भी भगा देता है ।उन्हें देखने का भी अधिकार नहीं ।5  साल का शुभू ये भी ये जानता है  कौनसी  चीज उसे माँगनी है और किसे वो सिर्फ  देख सकता है  । वो देखना च���हता है उस बड़े से TV में चलते हुए चलचित्र ।  शुभू जमीन पर गिर पड़ा। धनी ने उठाने की कोशिश की । शुभ-शुभ उठो  ।क्या हुआ  ?शुभू का बदन बुखार से तप रहा है । धनी ने रोना शुरु कर दिया ।मेरे भाई को क्या हुआ ? आसपास चलने वाले लोगों  पर  जैसे कोई प्रभाव ही नहीं है । गरीब के जीवन  की कोई कीमत नहीं ।लोग  देखते हुए निकल जाते हैं जिनकी नजर में गरीब  की हर बीमारी एक नाटक है ।   धनी ने  अपने भाई को  कंधे पर डाला बिना किसी की मदद के दौड पडा पास वाले खैराती अस्पताल में । जहां उसकी मां रोज शुभू को दिखाने आती है ।शुभू को देखकर डॉक्टर ने धनी से पूछा तुम्हारी मां कहां है ?  डॉक्टर ....डॉक्टर मेरे भाई को देखो उस को क्या हुआ है ?  खड़े-खड़े नीचे गिर गया।   मैं  मां को अभी बुलाकर लाता हूं ।  धनी दौडता हुआ  पहुंचा  उस बंगले पर जहाँ  उसकी मां रोज काम करने जाती है । माँ धनी को देखकर डर गई।  धनी , शुभू ...शुभू कहां है बेटा ?   शुभू आँखें  नहीं खोल रहा माँ ।वो अस्पताल  में  है।  घबराई हुई मां मालकिन के पास पहुंची ।मैडम... मैडम मेरा बच्चा बहुत बिमार  है ।मैडम मुझे घर जाना है । वो अस्पताल में है ।  मैं शाम को आपका  झाड़ू-पोछा कर दुंगी ।  अरे ऐसे कैसे ? तुम्हारे रोज के बहाने होते हैं।  नहीं मैडम वो बहुत बीमार मैडम । मैडम वो खडे खडे  गिर गया ।  रोज के बहाने नहीं चलेंगे । सारा काम खत्म करके जाओ ।  8 साल की मालकिन की बेटी ने हजार रुपए का वास गिरा दिया । मालकिन उसकी तरफ भागी और कहा ," लगी तो नहीं बेटा ।"  मम्मी वो गलती से गिर गया ।  अपनी बेटी का पैर सहलाते हुए मालकिन ने कहा कोई बात नहीं वास टूट गया तो पर तुझे नहीं लगनी चाहिए ।सुधा की तरफ आंखें दिखाई,  यहां क्यों खड़ी है चल जाके काम कर ।  सुधा ने पोचा उठाया और मालकिन के हाथ में  थमा दिया  अपना काम खुद कर ले । एहसान  नहीं करती है मुझे काम पर रखकर ।200 का काम करती हूं , जब 100 रूपये  देती है । तूने मुझे खरीद नहीं लिया है । तेरा तो भी हजार का वास टूटा है । मैं जाने कितने हजार रूपयों  को लात मारकर जा रही हूं । साड़ी के पल्लू  को कमर में  दबाकर।  धनी का हाथ पकड़ चल दी  खैराती अस्पताल की तरफ । #स्वाति_गौतम

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