संपूर्णता
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|   Aug 03, 2017
संपूर्णता

जब तुम आते हो ना तो संपूर्णता लाते हो साथ में... कल्पनाएं  भाप बन छा जाती हैं काले मेघा पर  स्वागत में तुम पर बरस जाने को..... प्यार जैसे अधूरे शब्द में  भी सम्पूर्ण प्रतीत होती हूं.... बिन संगीत सजे हो जैसे सारे स्वर ... किसी तानपुरे का तार जो जुड़ेगा सिर्फ तुम्हारे आने पर...... बिखरे  हों  इंद्रधनुषी रंग. .....तुम बिन  पसर जाती है रिक्ता चारों दिशाओं में....... घनिष्ठ अंधकार में तुम प्रतीत  होते हो सूरज की वो किरण जो सूक्ष्म के अंतरस  में  विद्यमान  हो. .......रसोई  से लेकर आंगन  द्वार  तक सारे शब्द, सौंदर्य ,शास्त्र ,संगीत बंधन मुक्त करते हैं नृत्य  तुम्हारे एक संकेत  पर...... द्वार पर तुम्हारे कदमों की आहट सुन मनःस्थिति    होती है सावन का संदेश देते मयूर सी.... एक दीपक छोड़ा है द्वार के आले में प्रतीक्षा का संदेश स्वरूप...... अब यह न कहना कल्पनाओ में जीती हो प्रेम कल्पना का ही तो दूसरा नाम है...... तुम ना हो फिर भी यह सोच लेना भर कि तुम हो कहीं समीप ही इसमें रस है.... # प्रतिक्षा 

 तुम्हारी प्रतीक्षा में सुख है..... निश्चित वैसा तीव्र प्यास की संतुष्टि बूंद-बूंद से हो तो हर बूंद का महत्वपूर्ण है.... अत्यंत  व्यस्तता और प्रतीक्षा को त्याग..... मैं तुम चलें किसी मनोहर स्थान पर किसी छोटी सी पगडंडी के सहारे ........हर तरफ लहलहाते गुलमोहर.. ....घनघोर वर्षा के बाद धरती से उठती सोंधी सी महक के साथ मिली मोगरा. चमेली.. चंपा.. गुलाब की गंद......  बड़ी सी झील के स्वछंद और निर्मल शीतल जल को स्पर्श करते अपने पैरों की उंगलियों से....  ताड़ के वृक्ष पर बैठी कोकिला अपने शब्दों के मोती बिखेरती.... दूर धुंधला सा एक ऊंचे पहाड़ का शिखर......... मैं  तुम  दोनों किनारों को निहारते . ..   प्रकृति के मौन में भी कितना सौंदर्य है..... महानगर के शब्दों में कितनी जटिलता ..कठोरता ...द्वेष..  छल .... कपट का समावेश.... मौन  त्याग जब समझाओगे प्रकृति के अंदर छुपे कई रसायन गूढ़ रहस्य.... मैं तर्जनी तुम्हारे अधरों पर रख धरती पर तिनके से लिख दूंगी.... प्राकृतिक सौंदर्य  को समझने के लिए अज्ञानता अनिवार्य है # स्वाति_गौतम

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