क्या आपकी भी ज़बान बड़ों क़े आगे इस तरह खुलती थी ?
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|   Feb 25, 2017
क्या आपकी भी ज़बान बड़ों क़े आगे इस तरह खुलती थी ?

 

 

चलिए वक़्त में थोड़ा पीछे चलते हैं ! आपके और मेरे छुटपन में ! जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे। बचपन पार करते हुए उम्र के अगले पड़ाव पर । बच्चे जिन्हें टीनएजर्स कहते हैं ।

आप और मैं भी कभी टीनएजर्स ही थे। information  explosion से कोसों दूर, सोशल नेटवर्किंग की एडिक्शन से अनछुए, और कंजुमेरिसम  की चकाचौंध से बचे हुए हम वो टीनएजर्स थे जिन्हें पढाई की फ़िक्र थी और उस उम्र की बेफिक्री भी थी ,आँखों में आसमान छूने के सपने थे और शरारतों की लत भी.....बस अगर कुछ नही था तो काफी हद्द तक , अपने माँ बाप के आगे जबान खोलने और उसे कैंची की तरह चलाने  की हिम्मत !

यूँ तो मेरे माता पिता काफी खुले विचारों वाले रहे और आज भी हैं,..घर में किसी रूढीवादी मानसिकता का चलन न था , अपितु माहौल में खुलापन था और साथ ही विचारों के आदान प्रदान की स्वन्त्रता भी ।

हाँ, हमने अपने मन की भी कही, ज़िद और बहस भी की लेकिन जबान लड़ाने और दो टूक जवाब देने की हिकमत हम कभी न कर पाए ।

पर जनाब ये तो उस ज़माने की बात थी जब हम वाकई शरीफ हुआ करते थे। किसी एक चीज़ की ख्वाहिश को बाकायदा एप्लीकेशन का रूप देकर, उस पर ‘ हाँ ‘ की स्टैम्प लगवाने की लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी , ओर कोई गारंटी नही थी कि जवाब हाँ में ही आए ! फरमाइशें तो हमारी भी हुआ करती थी ...बस अपनी मंज़िल तक कम ही पहुँचती थी ...लेकिन इस बात पर नखरे, धमकियां और सौ तरह के tantrums दिखाने के खुराफाती आइडियाज मुझे तो कभी नही आए ।

शिमला जैसे छोटे शहर में, एक सरकारी अफसर की बेटी होने का और एक मध्यमवर्गीय परिवार का हिस्सा होने का गौरव ही काफी था । कान्वेंट स्कूल और कॉलेज की पढाई और कुछ बन जाने की ललक , माँ बाप से बहुत कुछ ज़्यादा मांगने की कभी हिम्मत ही न हुई। 

सामान्य सी ज़िन्दगी में, छोटे शहर की सादगी में,दो कमरो के छोटे से मकान में,ज़रूरतों की छोटी सी 'लिस्ट' में और संतुष्टी के बड़े 'लिफाफों' में....ख्वाहिशें कायम रही लेकिन बड़ों से बदतमीज़ी और बेअदबी का ख्याल और उसके परिणाम डरा सा जाते थे।

मुझे आज भी याद है एक टीशर्ट जो मुझे बहुत पसंद थी और महँगी भी लेकिन हिम्मत ही नही हुई के जा के मम्मी से कह दूं के मुझे ले दे । भले ही इच्छा पूरी न हुई हो लेकिन अफ़सोस नही रहा और न ही कुछ चीज़ों की कमी को लेकर माँ बाप से शिकायतें । शायद वो डर ही था जो इज़्ज़त और बदतमीज़ी के बीच की सीमारेखा थी। माँ बाप के आगे क्या आपकी ज़बान खुलती थी ?

 

पर आज के बच्चों का क्या ? आप समझ ही गए होंगे मेरा इशारा किस ओर है ।

 ये तो आप भी मानेंगे कि वर्तमान में सन्तुष्टि की कोई सीमा नही और न ही आज की जनरेशन में न सुनने की सहनशीलता। हम सबको इल्म है के आज की generation यानि  हमारी औलाद किस लहज़े में बात करती है ओर इससे पहले की आप कुछ ओर कहे, एक करार सा जवाब झट से आ जाता है ।

चाहे वो एक आइसक्रीम की ज़िद हो या किसी महँगे खिलौने की, ब्रांडेड कपड़ों की हो या फैंसी ऐकससरीज़ की, मोबाइल फ़ोन, आई पैड या अन्य किसी गैजेट की, साइकिल, स्कूटी ,बाइक या आलिशान कार की, दोस्तों के साथ घूमने फिरने की या फिर अपनी किसी मनमर्ज़ी की, आजकल ये सुनना कोई बड़ी आश्चर्यचकित करने वाली बात नही कि आपके बच्चे कहें ....

"आपको क्या है मम्मी, हमारा जो मन करेगा हम करेंगे "?

"हमारी भी अपनी मर्ज़ी है"

"आप हमें इतना टोकते क्यों हो "?

"पॉकेट मनी तो बढाओ .....इतने में मेरा क्या होगा"?

"मुझे ये ड्रेस चाहिए तो बस चाहिए"

"आप एक मोबाइल फ़ोन भी नही ले कर दे सकते "?

"मेरे सब दोस्तों के पास है, मुझे भी स्कूटी चाहिए " !

 क्यों आपकी भी कुछ ऐसी ही हालत है ?

 डिमांड और सप्लाई का इकोनॉमिक्स ही है जो परेशान करती है या रह रह कर ताज्जुब होता है के हमारी तो हिम्मत नही होती थी और ये बच्चे हैं के कुछ भी बोलने की हिम्मत रखते हैं। माँ बाप होने के नाते बुरा भी लगता है। नेचुरल सी बात है लेकिन आजकल हम इस तरह के व्यवहार के अभ्यस्त से हो गए हैं। गुस्सा भी करते हैं और सह भी जाते हैं। अपने बच्चों को हर सुख सुविधा देना चाहते हैं पर शायद बड़ों की इज़्ज़त और चीज़ों की कद्र का अंतर नही समझा पाए।

थोड़ा आत्मवलोकन करें तो कही न कही हमारी परवरिश में त्रुटियां तो रही ही होंगी या फिर दोष इन्टरनेट, नेटवर्किंग, कांसुमेरिस्म और वेस्टर्न थिन्किंग पर भी मढ़ सकते हैं ।

या फिर इसे modernism क़े side effects कह लीजिए !

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