बेवफ़ाई ? वो तो बस यूँही
4538
4
|   Feb 15, 2017
बेवफ़ाई ? वो तो बस यूँही

जो लोग प्यार में नहीं होते उन्हें समझ नहीं आता कि प्यार के पंछी घंटो फ़ोन पर क्या बात करते हैं, वो भी रोज़ रोज़ ! और कई लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि कोई किसी एक ही बन्दे को रोज़-रोज़ मेल में क्या लिखता होगा ? और अगर यह सिलसिला सालों साल चले तो कई समझदार लोगों के दिमाग का पहले रायता फैलेगा और फिर तो वो सर से पैर तक रायता ब्रैंड अम्बेसेडर बन जायेंगे । हमारे ज़माने में मोबाइल फ़ोन का इतना चलन नहीं था, तो हर रोज़ घंटों फ़ोन पे चटने और चाटने का तजुर्बा हम भी नहीं रखते हैं । मगर मेल ! रोज़-रोज़ ! और वो भी किसी एक ख़ास बन्दे को ? हाँ, यह तजुर्बा तो हम रखते हैं । हमारी शिद्दत और प्यार पर शक़ ना किया जाये, लेकिन, सच कहें तो अब हमे भी याद नहीं कि हम रोज़-रोज़ मेल में क्या लिखते थे ? अरे ! सुनिए ! उफ्फ! मरने ना दौड़िए । वरना आगे की कहानी नहीं सुनायेंगे ।

कई बार हॉस्टल की सहेलियाँ पूछती थीं कि तू रोज़-रोज़ मेल चेक करने क्यूँ जाती है ? कंप्यूटर लैब वाले गार्ड की आँखों में भी हैरत के साथ यही सवाल घुला रहता था- रोज़? MCA के पहले साल मैंने रोज़ मेल की उसको और उसका जवाब ? बहुत ही औसत दर्जे का स्कोर रहता था मेरा, 4 पर 1 । मतलब मेरी 4 मेल और उसका 1 रिप्लाई । तो मैं लैब जाती थी और उसकी पिछली मेल पढ़कर, नई मेल लिखकर लौट आती थी । लौटते हुए मन में एक सवाल अक्सर होता था कि वो रोज़ रिप्लाई क्यूँ नहीं करता ? तब तो मन इस क्यूँ के पार नहीं देख पाता था लेकिन आज सोचकर हंसी आती है । सोचती हूँ कि जैसी मेल मैं करती थी, बाय गॉड , रोज़ उसे वो पढ़ लेता था यही बहुत है । भला कौन सा ऐसा सरफिरा होगा जो रोज़ ऐसी मेल का जवाब देने का माद्दा रखेगा ? मेरी मेल का पूरा चिट्ठा तो मुझे याद नहीं लेकिन मोटे-मोटे तौर पे यही कह सकती हूँ कि उसमे कुछ सवाल होते थे – तुम कैसे हो? कुछ हिदायत होती थी- अपना ख्याल रखना । बीच में अपने दिन का ब्यौरा- फलाँ क्लास में क्या हुआ, फलाने दोस्त से क्या बात हुई । शुक्र है ! इतना कॉमनसेन्स मुझमे बाकी रह गया था कि कभी शिक़ायत नहीं की उससे, कि तुम रोज़ मेल क्यूँ नहीं करते । और वो हर बार हर चौथी मेल का जवाब बिना चूके दे देता था ।

पहला साल तो गुज़र गया बिना किसी ख़ास जेद्दोजहत के । दूसरे साल में आते-आते ना जाने क्या सनक चढ़ी कि हममे थोड़ा सा गुरूर आ गया । नहीं-नहीं, शायद लालच बढ़ गया कि रोज़ मेल आये । नहीं-नहीं, शायद उसे जितना पा चुके थे, उससे ज्यादा पाने की ललक सर चढ़ गयी थी । या फिर हम प्यार में पागल होने लगे थे । मामला जो भी हो हमारा सुकून छीन लिया था इस 4 पर 1 के स्कोर ने । हम तरह-तरह की बातें सोचने लगे, जैसे कि जो मुझसे दूर रहकर इस तरह का असर मुझपे रखता है ना जाने पास वालियों पे कैसा कहर ढाता होगा ? कौन जाने मुझे तकलीफ़ होगी ऐसा सोचकर बताता ना हो अपनी किसी ख़ास के किस्से ? क्या पता वो मेरी सारी मेल पढ़ता भी है या नहीं ? कहीं वो इशारा तो नहीं कर रहा मुझे उससे दूर हो जाने का ? कहीं मेरा हर रोज़ मेल करना उसे दम घोंटू तो नहीं लगता ? कहीं मैं उसे परेशान तो नहीं कर रही ? ग्रह-नक्षत्र ख़राब चल रहे थे शायद जो मति ऐसी हो गयी थी । गुरूर ने सर उठाकर कहा, तुम्हें कौन सा लड़कों का अकाल पड़ा है जो उसके पीछे बेगैरत हुई भाग रही हो ? खत्म करो यह क़िस्सा, आगे बढ़ो । तुम्हें कोई ऐसा मिलना चाहिए जो तुम्हारी कद्र करे और तुमसे ढेर सारा प्यार करे । उसकी ऐठन उसे मुबारक, तुम अपना रास्ता अलग करो ।

गुरूर ने तो फ़रमान जारी कर दिया, मगर दिल का क्या करें ? यह तो वाकई बेगैरत हो चुका था । उसके पैरों का पाँवदान तो क्या उसके पैरों की धूल तक होने पर आमादा था । दिल ने गुरूर के सामने गिडगिडाना शुरू कर दिया- प्लीज उसे थोड़ा वक़्त और दो, सब ठीक हो जायेगा वरना मैं ख़ुद ही उसे अपने कूचे से निकल दूंगा । दिल ने अपने खून से गुरूर का दामन भिगो दिया तब जाके गुरूर कुछ पसीजा और कहा- ठीक है, लेकिन ज़रा काबू करो इस लड़की को, ऐसे नहीं चलेगा । हमने दिल का शुक्रिया किया और वादा किया कि अब हम रोज़ मेल नहीं करेंगे । अब हमने तीन दिन में एक बार मेल करना शुरू किया । और देखो तो हर मेल का जवाब आता था । हमारा स्कोर सुधर गया 1 पर 1 । दिल ने टेढ़ी नज़रों से गुरूर को देखा और गुरूर ने कहा- देखो, कब तक चलता है तुम्हारा यह ? चोट खाए गुरूर ने अपना मरहम ढूँढने की कोशिश की, हमने मेल करने वाला समय दोस्तों में बिताना शुरू कर दिया । ख़ुद को चीख़ती हुई ख़ामोशियों से दूर करने का और पूरी तरह बहरी हो जाने का यही रास्ता समझ में आया । महसूस हुआ कि कुछ लोग थे जो हमारा ध्यान अपनी तरफ खींचने की भरपूर कोशिश कर रहे थे । उनके साथ थोड़ा वक़्त बिताकर गुरूर को बहुत तस्सली मिलती थी । एक लड़के ने एक बार यह भी कहा कि लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप चल नहीं पाती । मैं चौंक गयी कि उसने ऐसा किस बिनाह पे कहा – क्या उसे मेरे बारे में पता था? कैसे पता चला ? मगर मेरा गुरूर बोला- ‘सही कह रहा है यह लड़का, मेरी नहीं तो कम से कम दूसरों की तो सुनो । देखो, यह लड़का कितनी कोशिश कर रहा है और एक तुम्हारा वो दोस्त है जिसे रत्ती भर लेना देना नहीं तुमसे । मगर तुम उसके पीछे दीवानी हुई जा रही हो ।‘ मैंने सर झुका लिया, गुरूर से लड़ने का दम नहीं था मुझमे और उससे ऑंखें मिलाके यह कहने की भी हिम्मत नहीं थी- चले जाओ मेरी ज़िन्दगी से, दफा हो जाओ, हम जा रहे हैं वापस अपने दोस्त के पास, उसे मेल करने । बेजार दिल प्यार निभाने की कोशिश कर रहा था और हम दिल से किया हुआ अपना वादा । हमने हर तीसरे दिन मेल करना जारी रखा और नए दोस्तों के साथ वक़्त बिताना भी । दिल और गुरूर दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश की । तजुर्बा कहता है कि जब भी हम सबको साथ लेकर चलने की पहल करते हैं तो हमारा ही नासपीटता है । दिल रोज़ ज़लील करता था कि जानता हूँ क्या कोशिश कर रही हो तुम ? और गुरूर रोज़ हडकाता था कि कब तक बैगैरत रहोगी ? ज़िन्दगी झंड होना किसे कहते हैं, यह हमे तब पता चला ।

तेरी बेरूख़ी को जायज़ साबित करने को हम ख़ुद को बेवफ़ाई के दर तक ले गए ।

तुझे ख़ुदा का दर्ज़ा देने की खातिर ख़ुद को गिराते चले गए ।।

तीसरे सेमस्टर भर यह नाटक ऐसे ही चला और फिर चौथे सेमस्टर में एक दिन अचानक चमत्कार हो गया । उसकी मेल आई और गुरूर के मुहँ पे ज़ोरदार तमाचे की तरह आई । मेल की शुरुवात थी- मेरी बेस्ट फ्रेंड कैसी हो ? आजकल तुम्हारी मेल कम आती हैं, बिजी हो क्या? दिल ने जी भरके गुरूर को जीभ चिढाई । उस दिन गुरूर ने सारे हथियार डाल दिये और मुस्कुराकर कहा – तुम जीते मैं हारा , देखो, शायद हो जाये एक दिन वो तुम्हारा । इसके बाद पूरा चौथा सेमस्टर हमने सुकून में काट दिया । हर दूसरे दिन मेल की और हर मेल का जवाब आया । दोस्तों से कुछ दूरी फिर से बना ली । बेस्ट फ्रेंड होने का जो ताज उस दिन हमने अपने सर पर पहना उसकी दिलों-जान से हिफाज़त की हमने । अपने प्यार को कभी मौका नहीं दिया दोस्ती के बीच आने का । दिल को जैसा सुकून मिला उससे यही लगता है कि उसे जितना मिला था उससे ज्यादा पाने की चाह थी और इसके लिए उसने मेरा तीसरा सेमस्टर नर्क बना दिया था । 

जो हुआ सब ठीक ही हुआ । मगर इस पूरे किस्से में यह बहुत ख़ास बात है कि अपने दोस्त से मन-मुताबिक जवाब ना मिलने पर हमारे गुरूर ने हमे किन हालातों के बीच खड़ा कर दिया था । कहानी क्या मोड़ ले सकती थी ? मगर हम फ़िसलने से बच गए क्यूंकि शायद प्यार बहुत गहरा था हमारा और हमने जल्दबाजी नहीं की उसे पा लेने की जिसके लिए हम पागल थे । या फिर सारी कायनात ने साज़िश करके उसे समय रहते वो मेल करने को मजबूर कर दिया । अपने प्यार को अपनी मंजिल नहीं रास्ता बनाया हमने । रास्ता जो कभी खत्म नहीं होता बल्कि ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है उस पर चलते हुए । उसको कभी दुवाओं में भी हमने नहीं माँगा, बेशक़ चाहा बहुत, मगर हमेशा दुआ यही की - कि जिसमे उसकी खुशी हो उसे वो मिल जाये । और खुशकिस्मती ही है कि उसे अपनी ख़ुशी हममे मिल गयी । कई बार जब लोगों की बेवफ़ाई के या बहक जाने के  किस्से सुनती हूँ तो सोच में पड़ जाती हूँ कि शायद उनके गुरूर ने, उनके गुस्से ने या फिर जिसे वो दिलोजान से चाहते हैं उनकी बेरूख़ी ने  उनको वहाँ पहुँचा दिया होगा । वो बच नहीं पाए , शायद मेरी तरह खुशकिस्मत नहीं थे ।

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day