देखो रूठा ना करो
11011
10
3
|   Dec 30, 2016
देखो रूठा ना करो

सुबह आँख खुली और बिस्तर पे उन्हें ना पाकर आलस तुरंत बिस्तर से कूद पड़ा और फिर अगले ही पल मुझे रात को हुई अनबन याद आ गयी ।

हुहं ! होंगे अपने कंप्यूटर पे । ऐसा सोचके मुहं बनाके हमने करवट बदली और नये सिरे से सोने की कोशिश की । मगर बाग़ी दिल में अलग ही ख्याल चलने लगे । ना जाने कब से जगे होंगे और ख़ुद से चाय बनानी भी नहीं आती तो यूँही बैठे होंगे मुहँ फुलाके । उठ जाती हूँ । चाय बनाके दे दूँगी लेकिन कुछ बोलूँगी नहीं जब तक कि वो मनाने की पहल ना करें ।आख़िर इतनी छोटी सी बात पे कोई इतना खफ़ा कैसे हो सकता है ? यह तो सरासर ग़लत है । इसलिए उनके गुस्से पे मेरा गुस्सा होना पूरी तरह जायज़ है ।

ओहो ! इस तरह बिस्तर पे लेटे लेटे ही मुकद्दमा दायर कर लेना और जीत भी लेना । 'चलो, उठो अब' दिल ने डपट लगायी और हम सरपट उठ गए । चाय बनायी पतिदेव को दी और बिना कुछ बोले अपनी चाय की प्याली लिए तनके चल दिये बालकनी की तरफ़ । सोचा, पीछे आते होंगे तो ज़रा अदा से प्याली हाथ में लिए कुछ देर खड़े रहे । इंतज़ार में चाय ठंडी होने लगी और मिज़ाज़ गरम । फ़िर थोड़ा सा रोना भी आ गया उनकी बेरूख़ी पे ।आँसू और चाय साथ में पीते हुए कुछ देर वहीँ खड़े रहे ।

कुछ और काम निपटाए और नाश्ता भी बिना बातचीत हो गया । अब हमसे रहाइश ना हुई गए और एक कुर्सी खींचके उनके पास बैठ गए । अब भी उनके बोल ना फूटे । कुछ देर हम भी ख़ामोश रहे फ़िर । धीरे से अपनी कुर्सी उनके पास खिसकाई । वो हमसे कतराते हुए वो अपनी कुर्सी में और सिमटके बैठ गए । उनका वो अंदाज़ देखके मुस्कुराये बिना ना रहा गया हमसे । यह जो मुस्कराहट होती है यह गुस्से की जानी दुश्मन होती है । बड़ी बेदर्दी से इतराते हुए खून कर दिया हमारे इतने जायज़ गुस्से का ।

फिर हमने यूँही कुछ पूछ लिया उनसे और वो कुर्सी छोड़ बाहर चले गए । हम बाहर गए तो वो अन्दर आ गए । हमने कुछ कहा तो उन्होंने जवाब में नज़रों से कातिलाना तीर चला दिये लेकिन हम भी जान की बाज़ी लगाये मैदान-ए- इश्क़ में डटे रहे । उफ्फ ! जितना हम मनाने की कोशिश करें वो उतना ही बनावटी अकड़ में आते चले गए । हाय ! लेकिन कितने मासूम और कातिल लग रहे थे गुस्से में मुहँ फुलाए । फिर हमने कुछ देर उन्हें अकेला छोड़ दिया । सोचा हमसे छुपा लों मगर हम अकेले इस आग में जल रहे हों ऐसा तो नहीं है । हम जान रहे थे कि जनाब रूठना एन्जॉय कर रहे थे ।

हमने कुछ और काम निपटाए और दुपहर का खाना बनाने का वक़्त हो चला तो हमने सोचा एक कोशिश और कर लेते हैं । जनाब को जनाब के ही अंदाज़ में घेर लेते हैं । जब कभी मैं उनसे बात नहीं करती तो वो पूछते हैं ‘मुहँ में दही क्यूँ जमा रखा है ?’ हम उनके पास बहुत ही संजीदा होके गए और पूछा ‘ सोच रही हूँ खाने में दही आलू बना लूं, ठीक रहेगा? ’ उन्होंने नज़रें चुराए चुराए सर हाँ में हिला दिया । हमने कहा तो ‘ थोड़ा दही दे दो, कल रात से अब तक तो काफ़ी जमा लिया होगा तुमने ’ । रोकते रोकते भी उनके चेहरे पे मुस्कान आ ही गयी । 

हम कुछ देर तो उस मुस्कान में खो गए और फिर उन्हें उनकी छोटी सी मुस्की (मुस्कान) के साथ छोड़, जाने को पलट गए । तभी वो कूद के हमारे पीछे पहुँच गए और ज़ोर से हमारा हाथ पकड़ लिया । हमने मुस्कान छुपाते हुए कहा ‘ छोड़ो, दर्द हो रहा है ‘ और इतना सुनके वो खिलखिलाके हंस पड़े । और हमने बाज़ी मार ली ।

सच कहूँ एक मुस्कान एक छोटी सी बात को बड़ा सा फ़साना बनने से रोक लेती है । तो हँसते रहिये और हँसाते रहिये । पति पत्नी के बीच छोटी मोटी बातों पे अनबन होती ही रहती है । उन बातों को छोटा मोटा ही रहने दे । ऐसी लड़ाइयों को हमारे आपसी प्यार को बढ़ाने और एक दूसरे को बेहतर समझने के काम आना चाहिए ।

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day