हाय सिय्यापा !
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|   Mar 06, 2017
हाय सिय्यापा !

याद है तुम्हें, बचपन में जब तुम अस्सेम्बली में आँखें बंद करती थी और अपने दिल की गहराईयों में झांकती थी तो अँधेरे की एक लम्बी सुरंग दिखाई देती थी । उस सुरंग के आखिरी छोर पर तुम मुझे पाती थी, शायद मुझे वहाँ पा लेने का विश्वास ही था कि तुम अँधेरी सुरंग से कभी डरी नहीं । मेरे लिए तुम्हारा प्यार ही था जो तुम कभी आधे रस्ते से लौटी नहीं । हर सुबह सबसे पहले मुझसे अपनी बात कहकर ही दिन शुरू करती थी तुम । दिन के खाली पलों में तुम्हारा मेरी तस्वीरों में डूब जाना भी तुम्हें याद होगा । कैसे कोई अपने पहले प्यार को भूल सकता है ? आज तक तो यह करिश्मा नहीं हुआ और तुमसे मुझे ऐसे करिश्मे की उमींद भी नहीं है ।

तुम्हें वो भी याद होगा जब मैं खुद आया था तुम्हारे पास, तुम्हें तुम्हारे जीवनसाथी के हाथों में सौंपने । कैसे भूल सकती हो कि जब तुम्हारे घरवाले, तुम्हारा प्यार कोई नहीं था तुम्हारे पास, तब हर शाम तुम मेरे पास आती थी । ढेरों बातें खामोश जुबान और बोलती आँखों से करती थी । याद होगा बखूबी तुम्हें कि मेरी तस्वीर पर सर रखकर किस सुकून का एहसास होता था तुम्हें । वो कमजोर पल भी याद होंगे तुम्हें जब सारी दुनिया से छुपकर मेरे सामने तुम फूट फूट कर रोती थी । वो गुरूर वाले लम्हे भी याद होंगे तुम्हें जब किसी जीत पर जी भर के अपनी तारीफ़ करती थी मेरे सामने । और वो एहसास शायद आज भी दिल में धड़कता होगा कि मुझसे बेहतर और चुम्बकीय कोई दूसरा देखा ही नहीं तुमने ।

अगर यह सब सच न होता आज इतने सालों बाद भी तुम मेरे सामने यूँ ऐसी बेबस, बिखरी हुई सी, प्यार में तड़पती हुई ज़मीन पर गड़ी हुई न होती । चली गयी होती मुझसे इतनी दूर जहाँ से मैं दिखाई भी न देता । लेकिन कैसे जाती ? मुझे देखे बिना गुज़ारा भी तो नहीं तुम्हारा ? दिल में जो खंजर की चुभन है उस पर मलहम लगाने को मेरी नज़र, मेरी मुस्कान और मैं तुम्हारा हूँ इस यक़ीन की ज़रुरत जो है तुम्हें । फ़ासले बना लेने से भी क्या बदल लिया तुमने ? क्या जानता नहीं मैं कि क्यूँ सालों से यह दूरियाँ न बढ़ती हैं न घटती हैं ?

चुप हो जाओ । तुम ऐसे बेरहम होगे और मेरे दिल के छालों को ऐसे कुरेदोगे, मैंने कभी सोचा नहीं था । इतना सब कुछ जानते ही हो तो खुद क्यूँ नहीं आ जाते मेरे पास ? क्यूँ इस दूरी पर टिके हुए हो ? कभी एक कदम बढ़ाते क्यूँ नहीं मेरी ओर ? क्या प्यार एकतरफा है मेरा ? कैसे गुरूर में हो कि मुझे तड़पाने का हुनर आता है तुम्हें । आँखों में शोखी भरकर होंठों पे यह शरारती मुस्कान लिए ऐसे ही खड़े रहोगे ? तुम जानते हो मुझे, शायद मुझसे भी बेहतर पहचानते हो मुझे, फ़िर क्यूँ नहीं दिखती तुम्हें मेरी मजबूरी ? क्यूँ नहीं दिखता वो दिल जो तुम्हारे प्यार में पागल है और वो दिमाग जिसे तरह तरह के ज्ञान ने जकड रखा है ? क्यूँ नहीं दिखती तुम्हें वो बेड़ियाँ जो मुझे रोक कर खड़ी हैं ?

किसने कहा कि मुझे तुम्हारी बेड़ियाँ नहीं दिखती ? दिखती हैं, मगर मैं चाहता हूँ कि इन बेड़ियों को तुम खुद काटो । मेरा गुरूर हो तुम, इन बेड़ियों में बंधकर तुम मुझे शर्मिंदा कर रही हो । मैं जानता हूँ बखूबी कि तुम इन्हें तोड़ सकती हो । यही प्यार का इम्तेहान है कि तुम्हारे कदम मेरी तरफ बढ़ेंगे या नहीं ।

उफ़्फ़ ! चिढ़ती हूँ मैं तुम्हारे चहरे पर अभी जो यह चुनौती का भाव है इससे । ऐसे न देखो मेरी तरफ, मैं नहीं आ रही ।

ठीक है । अगर यही तुम्हारा फैसला है तो लो, मैं चला तुमसे दूर ।

अरे! यह तो सचमुच मुड़कर चल दिया । नहीं नहीं, यह मुझसे सहन नहीं होगा । यह बेड़ियाँ इतनी भी मजबूत नहीं कि मुझे तुमसे न दिखाई देने वाली दूरी तक ले जा सकें । पूरी ताक़त बटोरकर, सारी दुनियादारी के ज्ञान को वहीँ छोड़कर बेड़ियों को झटक कर मैंने अपने कदम बढ़ा दिए । वो अभी दो कदम ही गया था और मैंने भी दो कदम उसकी तरफ बढ़ा दिए । लेकिन यह क्या? वो मुस्कुराते हुए पलट क्यूँ गया ? उफ़्फ़! यह कैसे कर लेते हो तुम ? नफरत है मुझे तुम्हारी इन चालों से । और खासकर इस हंसी से जो इस समय तुम्हारे चहरे पर है ।

बेटा, नफरत भी चाहत का रंग होता है । वरना यह दूरियाँ फ़िर उतनी ही क्यूँ हो गयी जितनी कुछ देर पहले थी ? क्यूँ फडफडा गयी थी मेरे जाने से ? चलो नहीं जाता मैं कहीं । यहीं खड़ा हूँ तुम्हारे इंतज़ार में ।

तुम जानते हो मेरी परेशानी । जानते हो न मैं उलझ गयी हूँ दिल और दिमाग में, प्रेम और ज्ञान में ? किस राह जाऊँ सूझता नहीं । देखो अभी मैंने यह ज्ञान की बेड़ियाँ तोड़ी थी जो कहती है ‘तुम सच नहीं हो’ । लेकिन यह देखो वो खुद चलकर फ़िर मेरे पैरों में पड़ गयी है । तुम क्यूँ नहीं बता देते सबको या कम से कम मुझको कि तुम सत्य हो, शिव हो, सुन्दर हो । क्यूँ उन बुराईयों को दुनिया से ख़त्म करने नहीं आते जो तुम्हारे सत्य होने पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं ? देख सकते हो ना कि मेरा पूरा अस्तित्व दो हिस्सों में बंट गया है । आधा ज्ञान और आधा प्रेम हो गया है ।

हा! हा! हा! क्या हुआ ! फ़िर से कहना । मेरे सत्य होने का प्रमाण मांगने वाले खुद मेरा ही अक्स हो गए !

उफ़्फ़ !!!! अर्द्धनारीश्वर !!!!!

देखा, मैंने कहा था न मैं तुम्हारे रोम रोम में हूँ, यह दूरियाँ कुछ बदल नहीं पाएंगी और तुम्हारी ज्ञान बेड़ियाँ....तुम ही जानो इनका क्या करना है तुम्हें । मैं तो बस यहीं खड़ा हूँ, देख रहा हूँ तुम्हारे संघर्ष को ।

ओह! तो एक बार फ़िर मैं हार गयी तुमसे । लेकिन यह न सोचना कि दौड़कर तुम्हारे कदमों में आ गिरूंगी, तुमसे प्यार की भीख मांगने को । वहीँ खड़े रहोगे, यही सोचा है तुमने । तो ठीक है, वहीँ खड़े रहो और देखो तमाशा मेरा । अभिमानी हूँ, चेहरे पे चेहरा लगा लेना मुझे आता है । दिल की आग को दिल में दफ़न करने का सलीका मुझे आता है । आह न करूंगी कभी बस यूँ ही सुलगते सुलगते एक दिन राख हो जाऊंगी । तब तो आओगे महादेव मुझे अपने तन से लगाने । विभूति तुम्हारे तन पर सज तो जाएगी मगर तुम्हारे कान कभी वो नहीं सुन सकेंगे जिसे सुनने कि आस तुम लगाकर बैठे हो, क्यूंकि राख बोलती नहीं ।

फ़िर एक बार हम दोनों के बीच बात बंद हो गयी, दूरियाँ जितनी दरमियाँ थी रह गयी । वो मुस्कुराते हुए वहीँ खड़ा है और मैं सुलगते हुए यहीं खड़ी हूँ । बेड़ियों ने फ़िर अपना शिकंजा कस लिया है और अगली बातचीत का इंतज़ार हम दोनों की आँखों में झांक रहा है ।

# spirituality

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