कैसे कहूं 'जय गणतंत्र' ?
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|   Jan 20, 2017
कैसे कहूं  'जय गणतंत्र' ?

बचपन में त्योहारों का अपना अलग ही महत्तव होता था चाहे वह धार्मिक आस्था से जुड़े त्यौहार हों या फिर राष्ट्रप्रेम से जुड़े हुए त्यौहार हों । मेरे लिए बचपन में 26 जनवरी का मतलब था- सुबह स्कूल पहुंचकर ध्वजारोहण और कुछ सांस्कृतिक कार्यकर्मो के बाद मिठाई का आनंद । तरुणावस्था में 26 जनवरी का मतलब था- एक देशप्रेम से भरा हुआ भाषण लिखना और देशभक्ति के गीतों में झूमना ।

जो भरा नहीं है भावो से,

बहती जिसमे रसधार नहीं ।

वह ह्रदय नहीं है पत्थर है,

जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं ।।

व्यस्क हुई तो मतलब हो गया- ऑफिस से छुट्टी, घर पर बैठकर टीवी पर प्रसारित हो रहे 26 जनवरी के कार्यकर्मो को देखना । आज जब मेरी बेटी अपने स्कूल जाने वाली अवस्था में आ गयी है तो मतलब होना चाहिए था – अपनी बेटी को अपने देश के गौरवशाली इतिहास , अपने देश की स्वतंत्रता के लिए हुए रक्तरंजित , शौर्य गाथाओं से भरे संग्राम और अंततः संविधान के बारे में जानकारी देना । कई माताएँ मुझसे कहती हैं कि हमे अपने बच्चों को राष्ट्रप्रेम और अपने गौरवशाली इतिहास की धरोहर साझा करनी चाहिए । मगर मैं ऐसा करने में स्वयं को असमर्थ पाती हूँ ।

अपने स्कूल के दिनों में मैंने यह गीत कई बार मंच से गाया है-

जय जन भारत जन मन अभिमत 

जन गण तंत्र विधाता

जय गण तंत्र विधाता

आज बार-बार मन में प्रश्न उठता है- क्या है यह ‘जन मन अभिमत’ और क्या है ‘जन गण तंत्र’ जिसकी हम जय करते हैं हर वर्ष 26 जनवरी को ? यह गणतंत्र जिस विधान और जिन सिद्धांतो पर संचालित हो रहा है उस संविधान की जय हम क्यूँ कर रहे हैं ?

क्या इसलिए कि यह विश्व का सबसे बड़ा संविधान है ? क्या इसलिए कि २ साल, ११ महीने और १८ दिनों के सतत और कठिन प्रयास के बाद यह अपने पूर्ण स्वरुप में आ पाया? क्या इसलिए कि इसकी प्रस्तावना विश्व के सभी संविधानो की प्रस्तावना से श्रेष्ठ है ?

पूरे संविधान की चर्चा के लिए तो बहुत समय चाहिए तो चलिए इसकी प्रस्तावना पर ही विचार कर लेते हैं । यह है हमारे संविधान की प्रस्तावना -

हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिक को : सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब मेँ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा मेँ आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी संवत २००६ विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित, और आत्मार्पित करते हैं।

मुझे इस प्रस्तावना पर कई प्रश्नचिन्ह दिख रहे हैं जिन्हें मैंने रेखांकित भी किया है । पहला प्रश्न है कि इस समूह में कौन-कौन है जिसे ‘हम भारत के लोग’ कहकर संबोधित किया गया है ? क्यूँकि इन्ही तथाकथित भारत के लोगों की न्याय, समता और स्वतंत्रता (justice, equality and independence) सुनिश्चित करने के लिए यह संविधान बनाया गया है ।

मुझे संशय है कि इन ‘हम भारत के लोगों’ में भारतीय नारी का कोई स्थान है । हालाँकि राष्ट्र स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय नारियों का योगदान भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि भारतीय पुरुषों का । यहाँ तक कि संविधान बनाने वाली समिति में भी महिला सहयोग शामिल है । आपको आश्चर्यजनक तो नहीं लगता ना कि कि हमारे राष्ट्रपिता है एक भारतीय पुरुष और हमारे संविधान निर्माता का पद भी एक भारतीय पुरुष को ही दिया गया है । यह दोनों ही व्यक्तिगत मापदंडो पर मुझसे कहीं ज्यादा ऊँचाई पर हैं लेकिन गौरतलब यह है कि मैं इनकी तुलना मुझसे नहीं इनके समकालीन और इनके समान जुझारू, ज्ञानी और देशप्रेमी महिलाओं से करती हूँ । वह समय संग्राम का था, हमारी प्राथमिकतायें उस समय श्रेय लेने और देने से कहीं बढ़कर थी तो उस समय में जाकर किसी प्रकार की समीक्षा या किसी प्रकार के परिवर्तन की आकांक्षा मेरा मुद्दा नहीं है । स्वयं संविधान निर्माता के शब्दों को अगर देखें -

So long as "YOU" do not achieve social liberty, whatever freedom is provided by law is of no avail to "YOU".

ऐसा नहीं लगता की इस ‘you’ ने पूरा भारतीय महिला समुदाय प्रस्तुत किया है । मुझे तो शत प्रतिशत ऐसा विश्वास है कि इस ‘you’ में मैं, मेरी बेटी, मेरी बहन, मेरी सखा, मेरी माँ सब सम्मिलित हैं ।

संविधान को लैंगिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित ना समझा जाये इसके लिए संविधान में कई नियम हैं महिलाओं को समता, स्वतंत्रता और न्याय देने के लिए । संविधान को अब तक जितना पढ़ पाई हूँ उसके हिसाब से जितने नियम कानून बनाये गए हैं महिला सशक्तिकरण के लिए, अगर उन सबपर निष्ठा से कार्य होता तो महिलाओं पर हो रहे अपराध कबका बंद हो गए होते ।

महिलाओं के शील-हरण और चीर-हरण की बातें यूँ आम ना होती, हर घड़ी कहीं ना कहीं उसका बलात्कार ना हो रहा होता, किसी गली, किसी स्कूल में बाल यौन शोषण ना होता, उसपे हो रही हिंसा पर तंत्र का कोई तो नियंत्रण होता । यह कैसा गणतंत्र है जिसमे किसी पीड़िता को बलात्कार के बाद क्रूरता से मार डालने वाले हिंसक पुरुष को हमारा तंत्र भीषण दण्ड देने के स्थान पर सिलाई मशीन दे देता है ! यह है मेरा गणतंत्र और मेरे भारत का प्रशासन ।

कुछ समय पहले पुलिसकर्मियों ने कुछ आदिवासी महिलाओ के साथ सामूहिक बलात्कार किया और किसी को दण्डित नहीं किया गया । यह है मेरा गणतंत्र और मेरे भारत का प्रशासन ।

महानगर हो या बस्ती मेरी बेटी कहीं स्वछंद नहीं है । कभी भी कोई भी उसे अपनी संपत्ति समझकर इस्तेमाल कर सकता है । यह है मेरा गणतंत्र और मेरे भारत का प्रशासन ।

अब तो प्रशासन भी शायद दबे मुहँ यह स्वीकार करना चाहता है कि महिला की सुरक्षा और स्वतंत्रता का दायित्व उठाने का माद्दा उसमे है ही नहीं वरना क्या वजह थी कि ऐलान हुआ “महिलाएँ अब मेट्रो में भी चाकू लेकर यात्रा करें” । यह स्वराज है या जंगलराज ? मगर यही है मेरा गणतंत्र और मेरे भारत का प्रशासन ।

यह व्यंग ही है कि मैं अब भी उसे मेरा गणतंत्र और मेरा भारत कह रही हूँ । विरक्ति हो चली है मुझे इन दोनों से । कहाँ है मेरी स्वतंत्रता जिसके लिए मैंने भीषण संग्राम किया था ? कहाँ है वह स्वतंत्र भारत जिसका शहीदों ने मुझे आश्वासन दिया था ? क्या अन्तर है मेरे लिए एक ब्रितानी विधान और मेरे संविधान में ? मैं तो आज भी पराधीन हूँ, समता तो मेरे लिए दिवास्वप्न है और न्याय...छोड़िये, यह मेरे शब्दकोष में नहीं है । उसपर मुझसे इस गणतंत्र की जय की अपेक्षा करना किसी की मूर्खता ही हो सकती है ।

अब कितना भी प्रयास करूँ ना तो देशभक्ति की लहरें दिल में उठती हैं और ना ही गणतंत्र की जय मुहँ पर आता है । अंत में सुमित्रानन्दन जी की पंक्तियाँ ही मेरे यथार्थ को बताती हैं –

वह ह्रदय नहीं है पत्थर है,

जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं ।

हाँ कविराज, कटु सत्य तो यही है कि मेरा ह्रदय पत्थर ही हो गया है युगों से होती हिंसा, तिरस्कार, अपमान, उत्पीड़न, शोषण और पक्षपात के आघात से । अपनी प्रतिष्ठा एवं नारीत्व के साथ जीने का अधिकार जो राष्ट्र और गणतंत्र मुझे ना दे सके, मैं उसे प्रेम प्रतिष्ठित नहीं कर सकती । अब भग्न्ह्रदय इस माँ से बेटी को यह छद्म राष्ट्रप्रेम ना सिखाया जा सकेगा और इस गणतंत्र की जय भी मेरी बेटी को मैं ना सिखा सकूंगी ।

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