कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है
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|   Jan 02, 2017
कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है

थारी लुगाई लगे तो म्हारे जैसी, पर मैं थारी लुगाई ना सू ।

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स फ़िल्म देखी, तो गुज़रा वक़्त और उसकी खट्टी मीठी यादों का सिलसिला दिलोदिमाग पे छाने लगा । जब हम इंदौर पहुँचे तो पहले ही दिन क्लास में एक लड़के पे नज़र पड़ी और उसका साइड प्रोफाइल देखके हम चकरा गए । मन ही मन ख़ुशी की फुलझड़ियाँ फूटने लगी । आहा! यह तो थोड़ा-थोड़ा मेरे प्यारे दोस्त से मिलता जुलता है । अच्छा लगा कि उसके जैसा कोई यहाँ है तो यहाँ भी मन लग जायेगा । कुछ दिन बाद इत्तेफाक से वो मेरे बगल वाली सीट पे आ बैठा ।

मैंने उसकी तरफ़ मुस्कुराके देखा और बातचीत शुरू हो गयी । बस यहीं पे खुशनुमा एहसास का खात्मा हो गया । क्यूंकि उसने कहा “ हैमा (हेमा), तुम्हारे पास एक पैन (पेन) एक्स्ट्रा है क्या? “ उफ्फ !! तौबा !! यक्क !! यह क्या है ? उसके मुखारविन्द से ऐसे सरस जलेबी सरीखे बैन सुनके लखनवी लड़की मन ही मन रो दी । प्यारे दोस्त का रूतबा और भी ऊँचा हो गया और यह हमशकल गर्त में जा पहुँचा । ऐसा लगा जैसे मेरा नटखट दोस्त मुस्कुराके कह रहा हो “वाह शर्मा जी ! रीबोक नहीं तो रीबूक ही सही “ उस दिन उस लड़के से सम्मोहन टूट गया और हम उसे नज़रंदाज़ करने लगे । क़िस्सा खत्म हुआ ।

फ़िर एक और रोचक क़िस्सा हुआ वो भी बेहद बोरिंग क्लास में । हमारे डाटा स्ट्रकचर की क्लास चल रही थी । हम सर झुकाए नोट्स कॉपी कर रहे थे कि अचानक एक आवाज़ ने चौंका दिया । हमने हडबडाके तुरंत सर उठाया तो देखकर यक़ीन ही नहीं हुआ कि हमारे लेक्चरर ने वो “उम्हुम्म” की आवाज़ की थी । बिल्कुल मेरे प्यारे दोस्त के अंदाज़ में । हम उन्हें कुछ देर एकटक देखते रहे । सचमुच ऐसा हुआ या हमने इतनी बोरियत भरी क्लास में छोटी सी झपकी ले ली और छोटा सा सपना देख लिया था ! लेकिन कुछ देर बाद फिर उन्होंने ऐसा ही किया हमारी ख़ुशी का आर-पार ना रहा । और उस दिन के बाद कभी हमने उनकी कोई क्लास गुल नहीं की और बस वो “उम्हुम्म” करे इसका इंतज़ार करते रहते थे । जैसे ही वो ऐसा करते हम सर झुका के एक हाथ अपने होंठो पे रखके चुपके से खुश हो लेते थे । वो सेमेस्टर बीता और उनका साथ छूट गया ।

उनको अलविदा कहके हम लौटे अपनी यादों से वापस । सामने दत्तो कह रही थी “ अच्छा तो इब जो तीसरी ढूँढोगे वो भी ऐसी सी सकल की ढूँढोगे “? और राजा अवस्थी ने वही कहा जो हमने तब सोचा था “बस हो गया हमारा, सारे शौक पूरे हो गए हमारे” ।

यादों के मेले में हम फिर जा पहुँचे । तुम जैसे दिखने वाले या तुम्हारे जैसे अंदाज़ वाले तो मिल जाते है लेकिन वो “तुम” नहीं होते ।

मुझे ना तुमसे ज्यादा ना तुमसे कुछ कम चाहिए

मुझे बस तुम तुम और तुम चाहिए ।

इस बीच एक मेल भी आई । मेल करने वाले का नाम और मेरे दोस्त का नाम एक ही था, हाँ लेकिन उसका पूरा नाम अलग था । उन दिनों ना व्हाट्सएप्प (WhatsApp) होता था, ना ऑरकुट ना फेसबुक । लेकिन उनदिनों मेल होती थी, याहू चैट होती थी और बहुतसारी वेबसाइट्स होती थी ग्रीटिंग कार्ड्स वाली । लड़को को अनजान लड़कियों से दोस्ती करने के यह साधन थे । तो कई मेल्स आती थी अजनान लोगों की । लेकिन हमने कभी किसी को रिप्लाई नहीं दिया । इस बार हम अपना यह व्रत तोड़ रहे थे  । हमने उसे रिप्लाई किया “हम तुम्हें रिप्लाई इसलिए कर रहे हैं क्यूँकि तुम्हारा नाम हमारे एक बहुत प्यारे दोस्त से मिलता जुलता है, इसके बाद हमे मेल मत करना क्यूँकि हमे तुम्हारी मेल नज़रंदाज़ करने में काफ़ी तकलीफ़ होगी” । बताने की ज़रूरत नहीं कि उस लड़के ने दोबारा कभो मेल नहीं की ।

MCA के ५ सेमेस्टर में कभी किसी में तुम्हारी झलक दिखी तो कभी किसी में । कुछ देर उनके साथ ने दिल को बहलाया भी । दिल ने उन्हें ख़ामोश दुवाएँ दी और फिर कभी किसी मोड़ पे हादसे की तरह टकरा जाने की ख्वाहिश भी की । सच कहूं तो तुम्हारी हर बात, हर अंदाज़, तुम्हारी शक्ल, बात करते हुए तुम्हारे हाथ हिलाने-डुलाने की अदा, सब कुछ इस तरह याद थी मुझे कि कहीं भी उनकी झलक दिख जाती तो वो सब किसी ना किसी तरह कुछ ख़ास महसूस होते थे । किसी शायर ने कहा भी है

ऐसा भी एक रंग है जो करता है बातें भी

जो भी इसको पहन ले वो अपना सा लगता है ।

कहीं कहीं से हर चेहरा तुम जैसा लगता है ।

हमने घूमके पतिदेव की तरफ़ देखा वो फ़िल्म से बहुत ही खुश थे । उनके ख़ुशी और सन्तुष्टि भरे चेहरे को देखके उनपे बड़ा प्यार आया और मन गा उठा ।

बीती बातों और अच्छी यादों का मन पे बड़ा साकारात्मक असर होता है, दिल खुश हो जाता है और यह यादें रिश्तों को अमृत से सींच देती हैं । जिन लोगों, जिन चीज़ों के हर रोज़ आसपास होने की वजह से हम उन्हें ‘घर की दाल’ बराबर समझने लगते हैं, याद आता है कि कभी उन्ही के लिए हम कितना तड़पे थे ! प्रेम और विश्वास की मद्धम आंच दिल में सुलगती रहती है । दिल शुक्रगुज़ार होता है, ईश्वर और उन सब लोगों का जो सफ़र में अलग अलग मोड़ पे हमे मिले और बिछड़े । हर किसी ने अपनी तरह से अपना योगदान दिया । एक कशिश भी जिन्दा रहती है दिल में कि ‘जो यह हमे ना मिल पाते तो?‘

छोटी छोटी गलतियाँ और ना-उम्मिंदी रिश्तों को उधाड़ने पे आमादा रहती हैं तो अच्छी यादें बखिया कर देती हैं । प्यार की चांदनी जो बिखरने सी लगती है हर रोज की व्यस्तताओं में, उसे करीने से बिछाने की अदाकारी होती है यादों में । सपनों के तारों पे हकीक़त की जो गर्द जम जाती है, उसे मांझकर फिर से टिमटिमाने की कला सिखा देती हैं अच्छी यादें । जो हमारे पास है उसे सराहने की इच्छा जाग उठती है । जीवन और दुनिया अच्छी लगने लगती है ।

तो आप बताइए कब ले चलेंगी मुझे अपने यादों के सफ़र पे?

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