मैगी की जय और जीवन की लय
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|   Jan 05, 2017
मैगी की जय और जीवन की लय

देवों में मेरे सबसे पसंदीदा हैं महादेव । उनको पसंद और प्रेम करने के बहुत से कारण हैं और कभी उनकी पूजा-अर्चना ना करने के भी मेरे अपने कारण हैं । लेकिन यह एक संयोग ही है कि अधिकांश कन्याओं और महिलाओं की पहली पसंद हैं महादेव । अधिकांशतः उनकी आराधना करती हैं और सोमवार को उनके नाम पे उपवास भी करती हैं । कन्याएँ उत्तम और मनवांछित पति पाने के लिए व्रत-पूजन करती हैं तो विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु की कामना से उपवास रखती हैं ।

हॉस्टल में यह दृश्य और भी मनोहारी और मुझ जैसी कन्याओं को लाभान्वित करने वाला हो जाता है । अपने अनुभव और अपने मित्रों से मिले ज्ञान के आधार पे मैं यह कह सकती हूँ कि भारत के लगभग सभी होस्टलों में पारम्परिक आधार पे रविवार की रात्रि का भोजन एक चुनौती होता है । या तो हॉस्टल मेस बंद रहती है या बहुत ही सात्विक भोजन जैसे चावल और पानी वाली दाल या फिर चावल और पानी वाली कढ़ी मिलती है । ऐसे में मुझ जैसी बालिकाओं की कोई विशिष्ठ हानि नहीं होती थी किन्तु निःसंदेह क्षतिग्रस्त वो कन्याएँ अवश्य होती थी जिन्हें सोमवार का उपवास करना होता था । अब ऐसा खाना खाके कितनी देर उदराग्नि को शांत रखा जा सकता है ? कम से कम २४ घंटे तो नहीं ।

इसमे यह बात भी विशेष ध्यान देने की है कि हॉस्टल में बालिकाएँ फलों की महत्ता को बिल्कुल ही नगण्य समझती हैं । उन्हें नहीं लगता कि फल खाने से किसी प्रकार की सहायता होगी । माताएँ भी पास नहीं होती कि वो मनुहार करें या डपटकर जबरन ही कुछ खिला लें, चाहे वो फल हो या सेंध नमक वाला आलू या फिर मीठा/ नमकीन साबूदाना । इन विषम परिस्थितियों में भी बालिकाएँ अडिग रहती हैं और अविचल होके उपवास करती हैं । उनकी अप्रितम श्रद्धा को शत शत नमन है मेरा ।

अब वापस लौटते हैं हॉस्टल में, रविवार की रात्रि १० बजे । अकस्मात् हॉस्टल में हडकंप मच जाता है । उन बालिकाओं के कक्ष में भीड़ लगने लगती है जिनके पास चोरी छिपे हीटर की व्यवस्था है । सौभाग्यशाली होती हैं ऐसी हीटर वाली बालिकाओं की सखियाँ । सभी उपवास वाली कन्याएँ अपना नंबर लगाने लगती हैं ।

मेरा समय रात्रि के ११:१० का । मेरा ११:३० का और इसी तरह सभी ऐसे कक्ष ११:४० बजे तक के लिए आरक्षित हो जाते हैं ।

आप सोचते होंगे किस बात का आरक्षण? अरे भई हीटर पे (maggi)  मैगी बनाने के लिए ।

ना माँगू प्याज़, टमाटर ना कोई प्लेट ना दोना ।

बस चाहिए एक मैगी पैकेट और हीटर वाला कोना ।।

आखिर पेट में संग्राम जो छिड जाता है, भूख बड़ी या श्रद्धा ? जिस तरह से मैगी बनायीं और खायी जाती थी तो लगता था शायद भूख बड़ी है । लेकिन जिस प्रकार कन्याएँ ठीक रात्रि के १२ बजते ही मैगी तक त्याग देती थी तो मालूम देता था कि श्रद्धा बड़ी ।

आप भी विस्मय में होंगे कि यहाँ वेबसाइट वाले आये दिन ओट्स महिमागान कर रहे हैं  । कभी मीठा ओट्स केक तो कभी नमकीन ओट्स पिज़्ज़ा बता रहे हैं । कोई इसे गुणों की खान बताते नहीं थक रहा तो कोई सब पकवानों में ओट्स वेरिएशन सुझा रहे हैं ।

और हम हैं कि बाग़-ए-सबा के ख़िलाफ़ आपको मैगी वंदन सुना रहे हैं । भला इसका क्या प्रयोजन हो सकता है!

भई देखिये ऐसा है कि कोई सात्विक या सेहतमंद तो नहीं लेकिन यह बहुत ही व्यक्तिगत चयन है । आप सभी जानते हैं कि जुबान का दिल-ओ-दिमाग से बड़ा गहरा रिश्ता है ।

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय |

औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ||

और यह भी कि गुज़रे हुए अच्छे वक़्त और अच्छी यादों का स्वाद मुहँ को लग जाये तो भी दिल-ओ-दिमाग तरोताज़ा हो जाते हैं ।

मैगी मेरे लिए ऐसा ही एक स्वाद है, जो कभी हॉस्टल की रविवार रात्रि का विहंगम द्रश्य याद दिलाती है तो कभी अचम्भा होता है कि कैसे १० Rs के एक मैगी से ५ लड़कियों की भूख तृप्त हो जाती थी ! जिस पैन में मैगी बनी उसे घेरकर ५ लडकियाँ बैठ जाती थी । सबके हाथ में एक चम्मच होती थी और उस मैगी का उठता हुआ धुवाँ मनो मैगी ना हुई पावन हवन कुंड हो गया और सब उस कुंड में अपनी भूख स्वाहा कर रहे हों ।

अति आत्मीय और मनोहारी दृश्य होता था वो । मैगी मेरे लिए वो याद भी है जो पहाड़ो का हुस्न देखते हुए सड़क किनारे छोटी सी घुमटी पे रुका हुआ वक़्त है । इतनी शुद्ध जलवायु और इतना नैसर्गिक सौन्दर्य और नितान्त फुर्सत के दिन । ऐसे में ट्रैकिंग के बाद किसी मैगी वाली घुमटी का मिल जाना ऐसा लगता था कि ' यदि पृथ्वी पे कहीं स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है बस यहीं है' और मैगी चरणों में तो में यही आभार सुमन अर्पण करती हूँ

सब भांति सदा सुखदायक हो दुःख के नाशंकारक हो ।

प्रतिपालक हो तुम हॉस्टल के अतिशय करुणा के सागर हो ।

जिनके कछु और आधार नहीं उनके तुम ही रखवारे हो ।।

इतनी अलग अलग मनभावन स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं कि तरोताज़ा हो जाती हूँ मार्केट में एक मैगी पैकेट देखके । काफ़ी देर तक मुस्कान मेरे होंठो का हाथ पकडे साथ चलती है । हम माताएँ अपने बच्चों को स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक भोजन देना पसंद करती हैं और मैं पूरी तरह सहमत हूँ इस बात से । प्रयासरत हूँ कि अपनी बेटी को अच्छे से अच्छा बनाके खिला सकूँ  । लेकिन साथ ही मैं याद रखने की कोशिश करती हूँ कि जब मेरी बेटी घर के बाहर कहीं अच्छा समय बिताती है तो वो खाने में क्या चुनती है । वो मेरी तरह अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में कुछ समय की दूरी पर है लेकिन दिल और दिमाग में शायद वह असर तो ऐसा ही रखता होगा । कभी जब वो अनमनी हो तो उसे बिना जंक फ़ूड या फ़ास्ट फ़ूड का ज्ञान दिये मैं वो खाने की चीज मुहैय्या करा देती हूँ और उसका मूड ठीक करने में या उसके राज़ उगलवाने में कामयाब हो जाती हूँ ।

लेकिन में यह भी मानती हूँ कि

अति का भला ना बोलना अति की भली ना चुप ।

अति का भला ना बरसना अति की भली ना धूप ।।

तो खान-पान में एक संतुलन बना रहना चाहिए , कभी करेले का जूस तो कभी कोला भी पीना चाहिए ।

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