मैं आभार कहाँ से लाऊँ?
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|   Jan 07, 2017
मैं आभार कहाँ से लाऊँ?

आज सुबह की ठंड में कुछ ठिठुरन के साथ सिहरन भी है,

अनमने से ह्रदय में चुभते कुछ सवालों के दंश भी हैं।

मन में अंतर्दव्न्द छिड़ा हुआ है । एक “क्यूँ” बन्दर की तरह उत्पात मचा कर हर डाली को झिंझोर रहा है और सारे फलों को जूठन कर फेंक रहा है । मन में एक उलझन यह भी है कि यही सवाल जो मेरी बेटी ने मुझसे पूछ लिया किसी दिन तो क्या जवाब दूँगी उसको ? सामने बैठा यह सवाल व्यंग के तीर चला रहा है और मेरे पास कोई ढाल नहीं है बचाव की । 

सवाल यह है कि मैं समाज की कृतज्ञ क्यूँ होऊँ? क्यूँ?

मुझे विद्यालय ने शिक्षित किया तो मैंने उसकी फीस दी फिर मैं उस विद्यालय के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

मुझे शिक्षक ने शिक्षा दी तो उसके बदले वेतन लिया फिर मैं उस शिक्षक के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

मोची ने ज़रूरत पड़ने पे मेरे जूते सिये तो अपने समय, श्रम और हुनर का मोल माँगा जो मैंने चुकाया फिर मैं उस मोची के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

सुरक्षा कर्मचारी ने भवन सुरक्षा का दायित्व लिया तो जितना मुनासिब समझा मुझसे मोल लिया फिर मैं उस कर्मचारी के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

मेरी कामवाली मेरे घर का काम करती है तो वेतन भी तो लेती है फिर मैं उस कामवाली के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

जब सड़क पर मुझे किसी ने छेड़ा तो समाज ने कहा मेरी सुरक्षा मेरा उत्तरदायित्व है तो फिर मैं इस समाज के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

जब मेरे परिजन की असमय मृत्यु हो गयी तो परिजनों के अतिरिक्त कोई आवलंबन देने को सामने ना आया तो फिर मैं इस समाज के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

एक सिपाही सीमा पे खड़ा देश रक्षा का दायित्व सम्भाल रहा है तो उसे यथोचित वेतन भी मिल रहा है तो फिर मैं उस सिपाही के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

एक किसान जब फ़सल उगता है तो जन जन का पेट भरे इस भावना से नहीं अपितु अपनी भूख और बाकी जरूरतों को पूरी करने के लिए उगाता है । उस फ़सल का मोल चुकाकर ही मैं उसे अपने घर लाती हूँ तो फिर मैं उस किसान के लिए कृतज्ञ क्यूँ होऊँ ?

काश! कोई ऐसा क्षण, कोई ऐसी बात याद आ जाये कि मैं कह सकूँ कि मैं इसलिए कृतज्ञ होऊँ ।  कभी समाज में किसी ने बिना मोल मांगे अपना कुछ मुझे दिया हो तो मैं कृतज्ञ होऊँ । यदि साहस करके श्रुतियों और मिथ्या नैतिक वचनों को चुनौती दे सकूँ तो शायद जान सकूँ कि आभार और कृतज्ञता कहाँ से लाऊँ?

क्यूँ समाज में सब यह कहते फिरते हैं कि हमे समाज और लोगों का आभारी होना चाहिए? किसने रटाया है हमे यह पाठ ? कब रटाया यह पाठ ?

यह तो तय है कि यह प्रथा है बहुत पुरातन । तो चलो वहीँ से शुरू करते हैं ।  उस समय में ब्राह्मण समाज शिक्षक था और यह पाठ भी बाकी सारे पाठों की तरह उसी ने सिखाया होगा ।  इसमे उसका अपना हित छुपा था । भिक्षा पे जीवन यापन करने वाला अगर लोगों को आभारी होना नहीं सीखाएगा तो उसका जीवन संकट में पड़ जायेगा । किन्तु क्षत्रिय ने, बाहुबल से भरे दल ने क्यूँ स्वीकार कर लिया आभारी होना? इसके पीछे एक कारण लगता है उस समय की शिक्षा व्यवस्था । जिस व्यवस्था के अंतर्गत शिष्य को शिक्षा पूर्ण होने तक गुरुकुल में रहना होता था । उसको प्रतिदिन भिक्षा मांगने जाना होता था जिससे उसके अपने और उसके गुरू का पेट भरता था । स्वाभाविक है कि जिस समाज ने भिक्षा देके वर्षों जिसे पाला हो उसे समाज का आभार होगा ही और बिना किसी यत्न और प्रश्न के वो कृतज्ञ हो जायेगा । तो क्षत्रिय समाज इस व्यवस्था के चलते अपने वंश में यह कृतज्ञ होने की परम्परा हस्तांतरित करता गया । शुद्र और व्यवसायी समाज को शिक्षा का अधिकार नहीं था और उन्हें ऐसे देखा जाता था जैसे वो सुन्दर समाज में एक धब्बा हैं ।  ऐसे में समाज उनको जीवन जीने का अधिकार दे देता है ऐसा सोचकर ही वो कृतज्ञ हो जाते थे या फिर बाहुबल और बुद्धिबल से डरकर कृतज्ञता का छद्मावरण ओढ़े रहते थे । 

जब हमारे समाज में इस व्यवस्था को नई ब्रितानी सरकार की नई जीवन शैली और शिक्षा पद्यति ने चुनौती दी तो पुरातन व्यवस्था काफ़ी हद तक चरमरा कर टूट गयी । और उसके साथ ही यह प्रश्न भी उठ खड़ा हुआ कि अब किस बात का आभार ? मैं जो हूँ अपने दम पे हूँ और हर किसी को उसके कौशल और सहायता का यथोचित मूल्य देकर हूँ । 

मगर यह बात मुखर ना हुई कुछ तो अपनी ही सदियों पुरानी रीत को सरेआम छोड़ते ना बना । और कुछ लोग जो विवेक की जगह नैतिक मूल्यों के आधार पर जीवनयापन करते हैं उनके लिए इन पाठों का पुनः मूल्यांकन एक गंभीर अपराध था या शायद पाप । आज के समाज में यह बात पूरी तरह से बार बार मुखर होती है कि हम में से कोई भी समाज के प्रति सच्ची निःस्वार्थ भावना से कृतज्ञ नहीं है । 

गर हमारा सामाजिक जीवन बस व्यापार बनकर ना रह गया होता तो हमारे बच्चे गलियों और मैदानों में अपनी स्वछन्द किलकारियों के साथ दौड़ रहे होते । हमारी बेटियाँ और बहनें निर्भय होकर सड़को और कार्यक्षेत्र में अपना अस्तित्व और कौशल प्रमाणित कर रही होती । यदि कोई किसी निर्बल को कष्ट देता तो समाज एकजुट होकर सबल को सही राह दिखाता । हमारे निम्न वर्गीय परिवारों के बच्चे कम से कम शिक्षित तो ज़रूर होते । 

ऐसा कुछ भी मुझे मेरे आसपास होता दिखाई नहीं देता उल्टा ऐसा जान पड़ता कि यह समाज मेरी शक्ति नहीं मेरा दायित्व हो गया है और दायित्व के प्रति आभार भाव कहाँ से लाऊँ मैं?

कभी मेरी संस्कृति ने बहुत गहन विचार के बाद ही “वसुधैव कुटुम्बकम” का सूत्र हमारे हाथो में दिया था क्यूंकि शायद उन्हें आभास हो गया था कि जब तक सारा समाज एक परिवार नहीं होगा तब तक संवेदनाये, प्रेम, आभार, सम्मान और दायित्व समाज के साथ जोड़ना भागीरथ प्रयास होगा । आज यही विडम्बना हमारे सामने है कि परिवार और समाज दो अलग अस्तित्व हो गए हैं और हर मन कभी ना कभी इस प्रश्न में उलझ ही जाता है कि समाज तेरे लिए मैं आभार और सम्मान कहाँ से लाऊँ?

मेरे पाठकों यदि आपमे से कोई मेरे प्रश्नों पे अपनी टिपण्णी या मार्गदर्शन देना चाहता है तो उसका हृदयातल से स्वागत है । कृपया मुझे इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने में अपना सहयोग दें । 

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