धैर्य की सीख
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|   Jun 27, 2017
धैर्य की सीख

 सभी माँ-बाप अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं। उनके लिए अपनी हिम्मत से बड़ कर काम करते हैं। अभी हाल की ही बात है,मैं अपने परिवार के साथ वैशनव देवी दर्शन को गई। बहुत खुश थी कि मैं माता के दर्शन को जा रही हूँ, पर मन में रह रह के सवाल उठ रहे थे कि बेटे को लेकर माता के भवन तक कैसे जाउँगी। मेरा बेटा 2.5 साल का है। पैदल चल नहीं सकता इतना, पिठु पे जाएगा नहीं, घोड़े पे बैठेगा नहीं क्योंकि वो डरता है, अब मुझे पालकी का ही सहारा था। यही सब दिमाग में चल रहा था कि हम कटरा पहुँच गए। पहुँचते ही देखा कि परची कटाने कि कतार 5 6 km लम्बी है। सोच में पड़ गई बच्चे के साथ इतनी गर्मी में कैसे खड़े रहेंगे। पता चला कि defence वालों का अलग काउँटर है। रिशतेदार साथ थे वो airforce से रिटायर हुए साथ थे।जल्दी ही काउँटर से टिकट लेकर हमने चड़ाई शुरु की। भवन पहुँचते ही मैंने शुकर मनाया कि बच्चे के साथ ठीक से पहुँची। माँ के दर्शन के लिए खड़ी थी तब एकाएक नज़र एक परिवार पे पड़ी। पति-पत्नि और 14-15 साल का लड़का था। वो अपने बेटे को पकड़ कर खड़े थे। घ्यान से देखा तो समझ आया कि लड़का मानसिक रूप से विकलांग( mentally challenged) था। लड़का दिखने में बहुत ही प्यारा था पर वो ठीक से ना ही खड़ा हो पा रहा था ना ही कुछ पकड़ पा रहा था। सबसे आगे खड़े लोगों ने उनको आगे आने को कहा दर्शन के लिए पर लड़के के माता-पिता ने आगे आने से मना कर दिया, ये कह कर मना किया कि माता के दरबार में कैसी जल्द बाज़ी। उनके इस धैर्य को देख मैं सोच में पड़ गई के मैं कितनी परेशान थी कि कैसै बच्चे को लेकर जाउँगी और दूसरी तरफ वो किन मुश्किलों से बच्चे को पैदल ऊपर भवन तक लाए और चहरे पर शिकन तक नहीं।

मैंने माँ का धन्यवाद किया कि माँ आपने जो भी दिया उसका धन्यवाद।

उस परिवार को देख कर मैंने अपनी परेशानी को बहुत छोटा जाना और मुझे मिलि धैर्य की सीख।

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