जीवनसाथी
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|   May 18, 2017
जीवनसाथी

दिल से बने जो रिशते उनका नाम नहीं होता, इनका कभी भी निरर्थक अंजाम नहीं होता, 

अगर निभाने का जज्बा दोनो तरफ से हो, 

तो ये पाक रिशता कभी बदनाम नहीं होता।

ये पंक्तियाँ मेरी अपनी नहीं हैं, पर ये मेरे दिल को छू गई। ये पंक्तियाँ उस पवित्र बंधन को बताती हैं जो हमें जन्म से नहीं मिला, पर यही रिशता आगे चल कर एक नय रिशते का आधार बन जाता है।

बहु, भाभी,चाची,मामी,और माँ का रिशता इसी रिशते के बाद शुरु होता है।

ये रिशता है पति पत्नी का।अंजान-जान पहचान से शुरु ज़रूर होता है, पर बाद में यही रिशता सबसे प्यारा बन जाता है। कभी अनबन कभी प्यार बस यही खूबसूरती है इस रिशते की।

कोई भी परिस्थिती आ जाए, पति पत्नि एक मज़बूत स्तंभ की तरह एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं।यही खूबसूरती है इस रिशते की अंजान होने के बावजूद भी एक अपनापन सा आ जाता है।

इस रिशते की असली खूबसूरती तब समझ आती है जब हम बुड़ापे के पड़ाव पर पहुँचते हैं।

आज कल मैं शाम होते ही अपने दो-साल के बच्चे को लेकर घर के पास वाले बगीचे में जाती हूँ। बहुत चहल-पहल होती है। कोई दोड़ लगा रहा होता है,कोई सैर कर रहा होता है। छोटे बच्चे खेल रहे होते हैं। मेरा बेटा भी खूब खेलता है। वहीं रोज़ना एक बूड़े अंकल-आंटी घूमते दिखते हैं। अंकल तो ठीक ठाक चल लेते हैं पर आंटी को लाठी का सहारा चाहिए होता है। एक तरफ आंटी ने लाठी पकड़ी होती है और दूसरा हाथ अंकल के कंधे पर होता है। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे का सहारा बन पूरा चक्कर लगाते हैं।

उनको देख हमेशा एक ख्याल आता है, शादी के शुरूआती समय से लेकर अपने बच्चों की शादी तक हम इतने व्यस्त होते हैं कि इस तरह का एक साथ समय व्यतीत ही नहीं कर पाते और जब हम अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं तब ये शरीर या सेहत साथ नहीं देते।

पति- पत्नि का साथ ही आखरी समय तक का साथ बन जाता है।

“कैसा अजीब रिशता है, अंजान पहचान से शुरु कर के अपनी नई दुनिया की पहचान बनाने का"

शायद इसी लिए पति-पत्नि को जीवनसाथी कहा जाता है क्योंकि यही वो रिशता है जो आखरी दम तक निभाया जाता है।

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