" मासूमियत "
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|   Jun 16, 2017
" मासूमियत "

नन्हा आरव आज बहुत परेशान था।मम्मी को बार बार कहने पर भी वो उसकी बात सुन ही नहीं रही थी। 

आज तो दादीमाँ से मैं उनकी शिकायत जरूर करूंगा। नन्हा आरव खुदसे बोलता हुआ दादीमाँ के कमरे में जाकर दादीमाँ से लिपट गया।

" दादीमाँ देखो ना मेरी मम्मा मेरी बात ही नहीं मानती है ,मैं सुबह से उनसे रिक्वेस्ट कर रहा हूँ ।"

" क्या हुआ मेरे राजकुमार को "

दादीमाँ लाड़ लड़ाते हुये बोली ।

दादीमाँ की शह पाकर आरव ठिनकता हुआ बोला ।मुझे ना उल्लू का पठ्ठा चाहिए।और मम्मी दे ही नहीं रही है ।सुबह से बोल रहा हूँ ।

आरव की बात सुनकर दादीमाँ मन ही मन मुस्काती हुयी बहू को आवाज लगाने लगी।

"क्या बात है बहू तुम मेरे पोते की बात क्यू नहीं मान रही हो।" 

"माँ जी मुझे समझ ही नहीं आ रहा है कि अारव को क्या चाहिए "।

"बहू तुम भी ना अरे इसे आलू का पराठा चाहिए "।

"ओह अब मैं समझ गयी माँ जी ,पर आपको कैसे समझ में आया मैं तो सुबह से सोच सोच कर परेशान हूँ की उल्लू का पठ्ठा कहाँ से लाकर दूँ।"

" अरे अपने बाप का बेटा है ना ,बचपन में वो भी आलू के पराठें को उल्लू का पठ्ठा बोलता था ।"

दादीमाँ की बात सुनकर सबके कहकहे गुंज गये ।

रसोई से अब आलू के पराठों की सौधीं सौधीं खूशबू भी आ रही थी । कितना मासूम होता है ना बचपन, छोटी छोटी खुशियों को सहेजे हुये,आपको नहीं लगता की आज हम बचपन को बहुत जल्दी छीन ले रहे है,बच्चों को अपनी मासूमियत के साथ रहने दीजिए, बाद में तो उन्हें जिन्दगी की गाड़ी में जुतना ही है ना ,

तो फिर क्या फायदा उन्हें वक्त से पहले जिन्दगी की रेस में शामिल कर देने का ...........

" नेहा अग्रवाल नेह "

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