रस्म-ए-मुंह दिखाई !
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|   Jun 24, 2017
रस्म-ए-मुंह दिखाई !

शादी को कितने भी साल बीते हो ,पर इस घटना की याद कुछ ताजा सी रहती है| रस्मो रीवाजों को निभाते हुए दोनो परिवार एक अनोखे रिश्ते मे बंध जाते हैं| इन तमाम रस्मो मे एक होती है सबसे अनोखी ,रस्मे मुहँ दिखायी !

रस्मे मुहँ दिखायी !! जी हाँ जब मारकेट मे कुछ नया आता है तो उसका प्रचार होता है और उसकी समीक्षा भी की जाती है |

और सच कहिये नया पडोसी ,नया शहर ,नयी साड़ी इन सब पर भारी है नयी दुल्हन की समीक्षा !!

नयी दुल्हन ...ये सुनते ही उत्सुकता परम सीमा पर होती है |घूंघट से झांक कर देखने की ऐसी उत्कट इच्छा होती है की क्या कहे !

अब ये ना कहिये की आजकल तो घूंघट नहीं होता | 

घूंघट या बिना घूंघट दुल्हन की रस्मे मुहँ दिखायी तो होती है | याद करें कुछ किरदारों को | 

सबसे पेहला घूंघट उठाती घर की बडी ...दादी सास या बुआ सास |

"ओहो ,क्या किस्मत है भाभी ,बहू तो चुन के लायी हो | इतना गोरा रंग ...चलो अगली पुश्त का रंग साफ होगा !"

" हाय मेरे पोते की बहू ,आँखे तरस गयी ऐसा चांद सा चेहरा देखने को "|

ना ना ये सिर्फ तारीफ नहीं ब्ल्की नयी नयी सास को प्रेम से दिया ताना भी है | 

हाँ हाँ दोबारा पढ कर देखे |

देखा ,ये रस्म यूँ ही नहीं इतनी चर्चित है |

चाची सास ,मौसी सास भी हैं कतार मे |

"ओह ज़िज्जी ,बहू तो वाकई चटक लायी हो ! बेटा तो ल्टटू बन घुमेगा"

हँसी के बीच हमारी सासू माँ को पेहली चेतावनी दी गयी जिसमे हमारा कोई हाथ नहीं था !!

मौसी सास ने घूंघट उठाया और माथा चूम कर कहा "अरे ,बहू तो सुंदर है ही पर हमारी दीदी आज भी सवा सेर हैं "|

हमारी जान मे भी जान आयी ,लगा की चलो इस घूंघट की आड मे चल रहे बाणो मे कोई योद्धा उनकी तरफ से भी है !

ना ये मत समझिये की सब तारीफ के पुल बांधेंगे |

दिल्ली वाली चाची ने देखा तो बस मुस्कराहट से कहा "बहू तो अच्छी है पर कुछ भी कहो मेरी मौसीरी बहन की बेटि बीस होगी" |

अब ये कौन सा किरदार है ??हम घूंघट के पीछे सोचने लगे |

और वो नन्दे ज़िनके लिये भाई किसी हीरो से कम नहीं ,उनकी तुलना किससे करूँ | भाई भी प्यारा और भाभी भी पर फिर भी भाई के आगे भाभी कम हैं |वो तो भैया को भा गयी वर्ना हमारे भैया के लिये तो रिश्तों की लाइने लगी थी !! तभी बारी आयी जेठानी जी की| घूँघट उठाया और नजरें मिला कर मुस्करायी , कहा कुछ नहीं पर कसम से लगा की बैकग्राऊंड मे गाना बजा हो "ज़िन्दगी हर कदम इक नयी जंग है ,जीत जायेंगे हम तू अगर संग है "

अरे उन्हे कैसे भूल गये | 

सासू माँ की सखियां जो सर से पैरों तक यूँ निहार लेती है जैसे आँखों मे स्कैनर लगा हो | और उनकी हैदायतें "देखो अब बहू तो ऑफिस जायेगी थोड़ा तुम करो थोड़ा वो |हमारे तो भाग फूट गये ,ये कामकाजी लड़कियां कुछ नहीं आता |आज तक बेटे को रोटी खिला रहे हैं |माँ हैं क्या करें ?"

और कोई अपनी बहू की इतनी तारीफ सुनाये की हमे लगने लगा की कोई सुपर वुमन है और मै ??

ओह माँ !!

बस तभी घूंघट सासू माँ ने उठाया और नजरें मिली |धड़कनो को कुछ आराम मिला |हम दोनो एक ही शक्स से बंधे थे |

ये तो सालो पहला दिन था गुजर गया यादें और हँसी ठीठोली दे कर | सालों बीत गये पर अब भी रस्मे मुंह दिखायी मे ऐसे किरदार दिखते हैं और मेरी कोशिश यही रहती है की दुल्हन घूंघट के पीछे भी मुस्कराती रहे |

अगर अपनी रस्मे मुंह दिखाई याद आयी हो तो लाइक व फोलो करें और उन किरदारों का ज़िक्र करें जो आपको नहीं भूले !

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