अपना घर
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|   Jul 13, 2017
 अपना घर

कल मैं किसी काम से पुलिस स्टेशन गई थी, वहां एक ऐसी औरत आई हुई थी अपनी बेटी के साथ. उसकी बेटी बहुत प्यारी थी, मुझे उसे देख के खुद की एक बेटी होने का अहसास हुआ. वो औरत बिहार के किसी गाँव से थी और ज्यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी. यहाँ शादी कर के आई थी, अपने पति के साथ रहती थी. उसका पति ठीक ठाक ही था. पर अचानक 6 महीने पहले उसे और उसकी बेटी को छोड़ के कही चला गया, कहा गया कैसे गया कुछ अता पता नहीं है उसका. पहले तो उसने गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाई थी पुलिस स्टेशन में आके, बाद में उसे पता चला की वो गायब नहीं हुआ है वो उसे छोड़ के चला गया है तो वो इसकी रिपोर्ट लिखवाई. एक महीने के इन्तजार के बाद उसके मायके वाले आके उसे ले गए बिहार वापस, वहा रही कुछ महीने फिर मन नहीं माना उसका तो वापस यहाँ दिल्ली आ गई अपने पति को तलाश करने. अभी उसका खर्चा पानी चलाने वाला भी कोई नहीं है. वो कभी यहाँ तो कभी वहां अपनी बेटी को लेके घूम रही है.

मुझे अजीब लगा पर साथ में ख्याल आया की क्या हमारा देश जिसे हम भारत माँ कहते हुए एक औरत का दर्जा देते है वहां क्या औरत की यही हैसियत है की कभी उसे आधी रात को घर से निकाल दिया जाता हैं तो कभी उसे बिना बताए मर्द खुद घर छोड़ के चला जाता है समाज से अकेले लड़ने के लिए. क्या कभी कोई औरतो को इतना विश्वास दिलाएगा की जब वो अपने माँ-बाप के घर से शादी के बाद निकल के अपने पति के घर जाती है तो वहां वो पूरी जिंदगी चैन से रहेगी उसे कभी भी किसी वजह से बेघर नहीं किया जाएगा? आज सच में समझ में आया की लड़कियां विदाई के वक्त इतना रोती क्यों है, क्योंकि वो सच में बेघर हो जाती है. माँ-बाप कहते है की बेटी अब तू अपने घर जा रही है और पति कहता है की आ गई तू अपने घर से, इस जदोजहद में औरत का अपना घर कौन सा है वो यही नहीं जान पाती और उसे फिर से बेघर कर दिया जाता है.

                                                                                                                                                                                        नीति निहारिका

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