ईश्वर की उत्तम कृति है नारी, फिर क्यूँ कहलाती है बेचारी!
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|   Aug 05, 2017
ईश्वर की उत्तम कृति है नारी, फिर क्यूँ कहलाती है बेचारी!

नारी शब्द सुनते ही कई पर्यायवाची शब्द दिमाग में आ जाते हैं, जैसे, सुशील, लाजवंती, सहनशील, सौम्य और सुदृढ़। कहते हैं बिन गृहणी के घर सुना लगता है, इसीलिए नारी को घर की लक्ष्‍मी भी कहते है।

एक नारी का ह्रदय बहुत विशाल होता है। तभी तो जब माँ के आँचल के छाँव से निकल कर ससुराल जाती है, तो पति के अनजाने परिवार को तुरंत अपना लेती है। जो अपने घर में  कल बिना किसी फिक्र घुमा करती थी, ससुराल में हंसते हंसते रिश्तों की बागड़ोर संभाल लेती है। बीवी से माँ बनने पर उसकी ज़िम्मेदारिया और भी बढ़ जाती हैं। लेकिन वो अपनी हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए आगे बढ़ती रहती है। और इन सबके बदले वो चाहती है, सिर्फ थोड़ी इज़्ज़त और थोड़ा प्यार।

दूसरों को माफ करना उसकी उदारता होती है। । बचपन से ही उसे सुनने की आदत हो जाती है - ये मत करो, वो मत करो; यहाँ मत जाओ, वहाँ मत जाओ; फिर भी वो अपना हर काम पूरा करके आगे बढ़ती रहती है। 

भगवान ने नारी को ऐसी शक्ति दी है कि वो विपरीत परिस्थिति में भी अपना रास्ता बना लेती है। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी मुसीबत का सामना करती हुई, हमेशा आगे बढ़ती रहती है।

वो प्यार की नरम छाँव है, तो लक्ष्‍मी बाई जैसी शक्तिशाली भी है। उसमें सरस्वती माँ की तरह ज्ञान बांटने की क्षमता भी है, तो दुर्गा माँ की तरह दुष्टों को नाश करने की शक्ति भी है। हर पुरुष की प्रेरणा एक नारी ही होती है - चाहे माँ के रूप मे, चाहे बहन के रूप मे, चाहे पत्नी के रूप मे, और चाहे बेटी के रूप मे। 

नारी तन से भले ही कोमल हो पर मन से बहुत मज़बूत होती है। नारी के बिना सृष्टि अधूरी है।

इसलिए कहते हैं,"ईश्वर की उत्तम कृति है नारी,फिर क्यूँ कहलाती है बेचारी!"

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