Thanku माँ (A True Story)
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|   May 02, 2017
Thanku माँ (A True Story)

माँ कभी भी एक बार में किसी सवाल के जवाब को सही नहीं कहती थी ना ही कभी एक बार सुन के उनको तसल्ली होती थी । हर बार एक ही बात अभी सही से नहीं याद कुछ कमी है थोड़ा और याद करो एक बार और सुनाओ । हुमारी किताबों को सर-माथे से लगा के रखती थी क्यूँकि उनको शिक्षा का महत्व पता था मगर हमें तब ये नहीं पता था माँ सुनती तो थी मगर उनको ख़ुद को नहीं पता होता था के हमारे जवाब सही हैं या ग़लत क्यूँकि वो तो ख़ुद ही नहीं पड़ सकती थी ख़ुद जो कभी स्कूल नहीं गई ।उस ज़माने में पढ़ाई को ज़्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी फिर जब माँ पहले दिन स्कूल गई तो क्लास की छत गिर गई और उनके सिर पर लग गई बस वही से स्कूल के नाम से ऐसे डरी के दुबारा कभी नहीं गई । कितनी बार नाना जी ने समझाया था मगर वो तो मानती ही नहीं थी और तो और घर में भी कमरे में ना सो के बाहर बरामदे में सोती थी के कहीं छत गिर गई तो सब मर जाएँगे और मैं अकेली रह जाऊँगी ।

आगे जा के उनको पढ़ाई का महत्व समझ आया मगर कभी भी उन्होंने अपने बच्चों को ये पता नहीं लगने दीया के वो ख़ुद उनके साथ ही पढ़ रही हैं अब माँ अख़बार पड़ लेती है क्यूँकी अपने बच्चों के साथ उसने भी सिखा था लिखना पड़ना ।

आज जब माँ से पूछो कोई ऐसी इच्छा जो वो पूरी करनी चाहती है तो उनका ये ही कहना होता है "मैं पढ़ना चाहती हूँ जिसे के मैं भी सब के साथ 'सुखमनी साहब जी' का पाठ कर सकूँ" बस ये इच्छा अधूरी रही उनकी ।

ख़ुद भले वो ना पढ़ पाई हों मगर उन्होंने हम सभी भाई बहनो को अच्छी शिक्षा दी और आज तक उनसे मिलने वाला कोई कभी उनके व्यवहार से अंदाज़ भी नहीं लगा पाया के उनको किताबी शिक्षा नहीं है क्यूँकि उनके जैसी व्यवहारिक शिक्षा कई पढ़े लिखे लोगों में भी नहीं होती ।

हमें गर्व है आपके हमारे माँ होने पे और धन्यवाद आपका हर उस के लिये जो आपने हमारे लिए किया

WE LOVE YOU MAA.

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