माँ का आंगन!
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|   May 04, 2017
माँ का आंगन!

आज फिर कैलेंडर लेकर बैठी हूं ।पिछले चार दिन से लगातार घर से फोन आ रहा है माँ पापा का- कब आ रही है? कब आ रही है ?

हर साल हम सभी यही करते हैं, छुट्टियां आते ही बरबस निगाहें तारीखों पर पड़ने लगती है।

 बच्चों की छुट्टियां हुई नहीं, कि हमारी सारी प्लानिंग शुरू ,कितने दिन मायके जाना है ,कब जाना है, वापसी कब की होगी? यहां घर पर सारी व्यवस्था बैठा कर जाना, कई बार लगता है बहुत दौड़ भाग हो जाती है इस बार रहने देती हूं, मगर पता नहीं जैसे ही घर से फोन आता है माँ या पापा का ,उस आवाज के मोह मात्र से हम सारी परेशानियां भूल जाते हैं और जोश के साथ अपनी तैयारियों में जुट जातें हैं।

यह दस-पंद्रह दिन जैसे पूरे साल की बैटरी चार्ज कर देते हैं ।

अपने मां बाप के साथ पुराने किस्से दोहराना, भाई, बहन, भाभियों के साथ देर रात तक गप्पे मारना, उन्हीं दुकानों पर घूम घूम कर शॉपिंग करना, मां के हाथ का खाना ,अपने बच्चों को अपने स्कूल -कॉलेज के बाहर से गुजरने पर, हर साल फिर वही कहानियां सुनाना( जो अब उन्हें भी याद हो चुकी हैं 😆)

शायद यह पंद्रह दिन हमें उन यादों की गलियारों में सैर करा आते हैं जो कभी हमारे हर दिन का हिस्सा थे।

ससुराल कितना भी सक्षम हो मगर मायके की चाह हमेशा बरकरार रहती है ,हमारी कोई भी उम्र क्यों ना हो जाए ।

किसी भी और छुट्टियों से ज्यादा खूबसूरत होते हैं यह कुछ पल।

 हर बेटी इन दस -पंद्रह दिन में पूरे साल का अपने मां- बाप का प्यार बटोर कर ले आती है।

 एक अनकहा विश्वास और शक्ति होती है इस प्यार में जो हर पल ,हर इम्तिहान में हमें लड़ने की ताकत देती है ।माँ के घर का सुख क्या होता है यह हम महिलाएं ही समझ सकती हैं।

"अपने घर को औरत खूब है सजाती,

 मगर मायके का मोह छोड़  नहीं पाती,

 ता उम्र औरत दो पाटों में है पिसती,

 फिर भी यही क्रम दोहराती ,

आज उस मुंडेर पर वह चिड़िया की तरह नहीं चहकती मगर कुछ देर ठहर अपना बचपन है जी आती,

मगर कुछ देर ठहर अपना बचपन है जी आती।।"

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