बेसन के लड्‍डू
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|   Jun 22, 2017
बेसन के लड्‍डू

हम सब भारतीय मिठाइयों के बहुत शौक़ीन है, इसलिए हर मौके पे चाहे वोह कोई शादी हो या कोई त्योहार या फिर किसी से मिलने जाना हो या फिर किसी मेहमान को घर आना हो. मिठाई होना तोह ज़रूरी ही है. आज कल मिठाइयों की बड़ी बड़ी दुकाने खुल गयी है जहा तरह तरह की मिठाईया मिलती है. पर अगर में अपनी बात करू तो घर की बनी मिठाई की तोह बात ही कुछ और होती है.

हमारे यहाँ हर मौके पे अलग अलग मिठाईया बनती है. होली पे गुजिया, जन्मदिन पे हलवा, जन्माष्टमी पे नारियल की बर्फी और दीवाली पे गुलाब जामुन. मम्मी तो हर तरह की मिठाई बनाने में एक्सपर्ट थी. सच कहु तो बाजार की मिठाइयों में वो सवाद ही नहीं था क्योकि गाजर के हलवे से लेकर गुलाब जामुन तक घर में बनते थे वो भी ताज़े हमारी फरमाईश पर.पर एक मिठाई जो सिर्फ एक स्पेशल जगह पे ही मिलती थी वो है बेसन के लड्‍डू. हर किसी के बचपन की यादे गर्मी की छुटियो से जुडी होती है और गर्मी की छुटिया मतलब नानी का घर.

हमारा फिक्स था हर गर्मी की छुटिया शुरू होते ही नानी के घर जाने का प्लान बन जाता था और हाँ इसी वजह से स्कूल का होमवर्क भी जल्दी ख़तम कर दिया जाता था की वहाँ सिर्फ मस्ती कर सके. हम वहाँ पहुंचते साथ ही अपनी फरमाइशें शुरू कर देते थे और जिसमे स्पेशल फरमाइश होती थी बेसन के लड्‍डू की.

जैसा मेने कहा की हमारे यहाँ मिठाईया हमेशा घर में बनती थी वैसे ही बेसन के लड्‍डू हो तोह नानी के घर के हो वरना न हो. नानी ताज़ा घी तैयार करती थी लड्‍डू बनाने के लिए और फिर शुरू होता था लड्‍डू बनाने का प्रोग्राम.  बेसन भूनते हुए पूरे घर में उसकी सुगंध भर जाती थी और हम बच्चे किचन के आस पास मंडराना शुरू कर देते थे. पडोसी भी आवाज़ लगा कर पूछते थे की- "लगता है लड्‍डू बन रहे है. हमे भी चखाना" और हमारा जवाब होता था की- "अगर हमसे बच गए तोह ही तोह मिलेंगे आपको. अभी तोह हम भोग लाएंगे".

सबके मुँह पे पानी आ रहा होता था और सबकी नज़रे कड़ाई पे टिकी होती थी की कब जाके चखने का मौका मिलेगा. हर ५ मिनट में आके नानी से पूछते थे की- "बन गए क्या लड्‍डू नानी". हम सब खाना पीना छोड़के लड्‍डू के लिए पेट में जगह बना रहे होते थे.

बेसन और चीनी भूनने के बाद बनते थे लड्‍डू जिसमे हम अपना पूरा योगदान देते थे, ताकि बनाते हुए थोड़ी बहुत संतुष्टि भी की जाये. नाना नानी लड्‍डू बनाते जाते थे और नानी के थाली में रखते ही चुपके से हमारा हाथ उसे उठा कर सीधा मुँह में ले जाता था. तोह थाली में काम जमा होते थे हमारे पेट में ज्यादा.

एक लड्‍डू मुँह में और एक एक दोनों हाथ में लिए घूमते रहते थे.नाना, नानी, मम्मी और सारी मासीया सब लगे होते थे लड्‍डू बनाने में और हमे खाता देख कर मुस्कुराते रहते थे. जब हमारा पेट भरता था तब जाके डब्बे भरना शुरू होते थे. उसमे भी हम नोटिस करते रहते थे की कम नहीं होने चाहिए क्योकि एक डब्बा पापा के लिए लेके जायेगे, एक डब्बा बाकी घर वालो के लिए और एक हम बच्चो का. पूरे एक साल के लिए सारा प्यार नाना नानी उन बेसन के लड्‍डू के डब्बे में भरकर हमारे लिए देते थे.

ऐसे ही सारी छुटियो में हमारी फ़रमाशे चलती रहती थी और बाकी सब लोग लगे रहते थे उन्हें पूरा करने में. जब जाने का वक़्त आता था तोह सारा प्यार बटोर कर हम अपने साथ ले जाते थे. वहाँ पापा के पास पहुंच कर रस्ते से ही सारी बाते बताना शुरू हो जाते थे की कहा कहा गए और क्या क्या किया और पापा भी घर आते ही बैग में लड्‍डू का डब्बा ढूँढ़ते थे.

हम बच्चे पूरे घर में सबको उछल उछल कर बेसन के लड्‍डू बाटते थे और सारे किस्से सुनाते थे पर सबका धयान हमारी बातो से ज्यादा लड्‍डू खाने में रहता था. जहा हम सब लड्‍डू का स्वाद ले रहे होते थे वही नाना नानी हमे याद कर रहे होते थे.

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