नयी बहु के हाथ का स्वाद
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|   Jul 04, 2017
नयी बहु के हाथ का स्वाद

मेरी शादी में कुछ ही दिन बचे थे, और मम्मी रोज़ मुझे खाना बनाना सीखने को बोलती रहती थी. ऐसा नहीं है की मुझे खाना बनाना ही नहीं आता था पर हाँ कुछ मीठा जैसे की खीर, हलवा ये सब बनाने में अनुभव नहीं था. तो जब भी घर जाती थी मम्मी या तो खीर, कभी सूजी का हलवा तो कभी गाजर का हलवा बनाना सीखती थी की वहाँ जाके कुछ न कुछ मीठा बनाना पड़े तो आना चाहिए.

साथ में मस्त सभी तरह की दूसरी चीज़े भी सीखायी जैसे वहाँ मैं शेफ बनके जा रही हो. हर दुसरे दिन ट्रेनिंग चलती रहती थी. हलाकि मैं वर्किंग थी फिर भी सब कुछ बनाना सीख लिया की कूकिंग स्किल्स तारीफ के काबिल हो गयी थी.

शादी वाले दिन विदा होते हुए भी मम्मी ने कान में कहाँ अच्छे से हलवा बनाना ज्यादा घी वाला सबको पसंद आना चाहिये और मैंने मम्मी को आँसू भरी आँखो से घूर के देखा की बस करो हो जाएगी आपकी लड़की पास. शादी के दुसरे दिन तो किसी ने किचन में घुसने नहीं दिया तो कोई मौका नहीं मिला फिर मेने सोचा की आराम से बना लुंगी जब कोई कहेगा. जब अगले दिन भी किसी ने कोई फरमाईश नहीं की तो लगा कही सबको ये तो नहीं लग रहा की वर्किंग हूँ इसलिए खाना बनाना ही नहीं आता होगा. इसलिए मैं अपने आप ही हलवा बनाने लगी, जैसे मम्मी ने कहाँ था अच्छे से देसी घी डाला और सबको सूजी का हलवा नाश्ते के साथ परोस दिया.

सबने तारीफ़ की और शगुन में पैसे भी दिए पर इनके दादाजी खाते रहे और कुछ नहीं बोले. पर फिर भी एक और कटोरी हलवा माँगा तो लगा की अच्छा ही बना है. अब हर किसी का तारीफ करने का तरीका अलग अलग होता है. सबको हलवा अच्छा लगा तो सोचा की रात का खाना भी मैं ही बनाऊ.

ये तो मुझे पता था की जैसे इनको बेसन की कड़ी अच्छी लगती है वैसे ही घर में सब बड़े शौक़ से पकोड़े वाली कड़ी खाते है और शादी में भी भारी खाना खाया था तोह छोले भठूरे से अच्छा है बेसन की कड़ी ही बनायीं जाये. मैं लग गयी शाम की चाय के बाद किचन में बेसन घोल के पकोड़े बनाने में. अब पकोड़ो की खुशबू से मेरी पति और देवर किचन के चक्कर लगाने लगे. जितने बनती थी उतने के उतने थाली में रखते साथ ही ख़तम हो जाते थे. कितनी देर तक यही चलता रहा फिर जब मैने अपने पति देव का हाथ पकड़ा तो मेरे देवर ने भी भाप लिया की अब भाभी और पकोड़े देने वाली नहीं .

कड़ी में मस्त छौक लगाके जैसे ही फिर से इन दोनों को किचन की और आता देखा मैने सारे पकोड़े कढ़ाई में दाल दिए और ये देख कर दोनों मुस्कराने लगे. कुछ देर बाद कड़ी और चावल दोनों तैयार हो गए. सबको भूख भी लगी थी और मेरे हाथ का स्वाद भी चखना था तो सब बुलाते ही टेबल में आके बैठ गए.

मैने सबको परोसना शुरू किया. सबसे पहले दादाजी को फिर पापा को और लास्ट में पतिदेव और देवर को जो पहले से ही पकोड़ो से पेट भर चुके थे. सब बड़े शौक से कड़ी चावल खा रहे थे और तारीफ कर रहे थे पर दादाजी बिना कुछ कहे चुप चाप खाना खा रहे थे और मुझे लग रहा था की पता नहीं उनको पसंद भी आयी है या नहीं. हार के मैने पूछ ही लिया की-" दादाजी, आपको पसंद नहीं आया शायद खाना". तब इन्होने मेरे कान में कहाँ कि - "तुमने दादाजी को घी नहीं डाला, उनको घी के बिना खाना पसंद नहीं आता". तब मैने एकदम से उठ कर उन्हें घी परोसा वह भी अच्छे से और पुछा कि- "अब बताईये कैसी लग रही है". तब जाके दादाजी के मुँह से निकला- " वाह अब लग रही है कड़ी स्वादिष्ट, मज़ा आ गया". धीरे धीरे मुझे सबके स्वाद पता चल गए कि दादाजी तेज़ मीठे के शौक़ीन है और घर में घी के बिना किसी को खाना पसंद नहीं आता.

अब सबके हिसाब से ख���ना बनाना आ गया है और सब तारीफ करते नहीं थकते. कौन एक चमच चीनी लेता है और कौन चीनी से भरी चाय पसंद करता है सब का हिसाब रखती हूँ और अब जब भी कुछ मीठा बनता है दादाजी को सबसे पहले खिलाती हूँ और सुनने को मिलता है "डिलीशियस".

पर हाँ आज भी जब कड़ी बनती है घर में तो वही पुरानी बात याद आती है और मैं हमेशा घी के लिए सबसे पूछती रहती हूँ क्योकि हमारे यहाँ घी के बिना किसी को स्वाद नहीं आता.

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