बेटी को सुखी देखना चाहते हैं तो झुककर चलिए !!!
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|   Jan 19, 2017
बेटी को सुखी देखना चाहते हैं तो झुककर चलिए !!!

लड़का और लड़की ... दोनों ही शब्दों में " एकमात्रा " का छोटा सा फर्क है पर ये फर्क तब ज्यादा बढ़ जाता है जब इन शब्दों के आगे " वाले " जैसा शब्द जुड़ जाये ...जैसे - लड़की वाले " और " लड़के वाले " ... मेरे अनुसारतो " लड़की वाले " वो हैं ...जो सालों बेटी की परवरिश करते हैं ,संस्कार देते हैं ,पढ़ाते हैं ,सक्षम बनाते हैं और अपनी बेटी को दूसरों के हाथ ख़ुशी - ख़ुशी सौंप देते हैं ...लेकिन ... समाज में कई परिवारों में आज भी शादी इसी शर्त पर होती है कि " दुर्गा " के साथ "लक्ष्मी" ( दहेज़ ) भी घर आनी चाहिए ...तभी बेटी को " गृहलक्ष्मी " का दर्ज़ा मिलेगा ...इन बेचारे " लड़की वालों " की बात यहीं खत्मनहीं होती ... उनके लिए समाज में नए नियम भी हैं ...हालाँकि ये नियम हर परिवार में नहीं... कई परिवार सिर्फ बेटी लेकर जाते हैं और उसको बेटी ही रहने देते हैं ...लेकिन ... इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि समाज का एक " वेलएजुकेटेड " तबका ही इन नियमों को अपनी सुविधा से बनाता है ..शर्मनाक ... लेकिन ...ये नियम कुछ इस प्रकार हैं !!

* अगर आप " लड़की वाले " हैं तो सबसे पहले आप अपने सम्मान को साइड में रख दीजिये ...

* आपकी इज्ज़त अब कुछ भी नहीं है ...क्योंकि आपकी बेटी अब दूसरे घर की इज्ज़त जो हो गयी है ...

* आप तब तक खड़े रहिये जब तक " सम्मानित लड़के वाले " बैठे हैं ...

* पहले खाना खाने का जन्मसिद्ध अधिकार सिर्फ " लड़के वालों " को है ...आप पहले भूल से भी नहीं खा सकते ...

* " लड़की वालों " के हाथ... सिर्फ जोड़ने के लिए और सर... सिर्फ झुकाने के लिए है ...

* बात कोई भी हो ... पहल सिर्फ " लड़की वालों " को करनी है ...ऐसे ना जाने और भी कितने घटिया नियम हैं...खास बात ये है कि ये नियम एक चेतावनी के साथ "लड़की वालों पर थोपे जाते हैं ...

जैसे - " गलती से भी यदि एक भी नियम का उल्लंघन माँ पिता से हुआ तो असर " बिटिया रानी " की निजी ज़िन्दगी पर पड़ता है ... आपने वो कहानी तो सुनी ही होगी " रानी की जान तोते में थी " बिल्कुल वैसे ही ... माता- पिता की जान बेटी में होती है ... और माँ बाप के साथ बेटी को भी घटिया नियमों के साथ समझौता करने का पाठ पढ़ाया जाता है ...ख़ुशी की बात ये है ये घटिया नियम OFFER भी देते हैं ... जैसे -

यदि आप इन नियमों का पालन नहीं करना चाहते और बेटी को सुखी भी देखना चाहते हैं तो ...झुककर चलिए और गलत बात सहन करने में सक्षम हो जाईये ,बेटी का मानसिक उत्पीड़न देखिये पर चुप होकर ... फिर देखिये लाड़ली का सुखी जीवन ...वरना धमकियों में उन्हें लड़की के घर बैठनेका खतरा भी दिखाया जाता है ...जो भी हो ...मैं समझती हूँ ... शायद इन घटिया नियमों को जबरदस्ती थोपना भी अपराधकी श्रेणी में आना चाहिए ...

" मानसिक उत्पीड़न " आप उम्र का लिहाज़ करते हुएसहन नहीं कर सकते ... " सम्मान " हर व्यक्ति का है ...आत्मसम्मान हर कोई बचाना चाहता है ... " लड़का - लड़की " को सामान अधिकार तो कई हद तक मिल गए हैं पर ... शर्मनाक सच ये है कि " लड़की वाले " आज भी समाज में सर झुकाए खड़े नजर आते हैं !!!

महसूस जरुर होता होगा ...

जब आपकी बेटी की शादी हो !

जब आपकी बहन की शादी हो !

जब आपकी भतीजी की शादी हो !

जब आपकी भांजी की शादी हो !

Written by - Pooja Vrat Gupta 

( Freelancer & Blogger )

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