सपने बिखरे तो क्या हुआ ! उसे तो घर समेटना है।
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|   Jan 23, 2017
 सपने बिखरे तो क्या हुआ ! उसे तो घर समेटना है।

उम्र शायद 45 की होगी उस औरत की जो मेरे सामने ये कहने से नहीं चूकी कि...

" मुझे पछतावा है " मैं बड़ी - बड़ी डिग्रियाँ लेकर भी कुछ नहीं कर पायी ... " पर तुम करो बेटा " ...  इस उम्र पर पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी सँभालने वाली गृहणियाँ अक्सर दिल में यही टीस लेकर ज़िन्दगी को रगड़ती हैं ..." मैं आज ये होती लेकिन !!! 

ये अहसास उन्हें तब ज्यादा तकलीफ देता है जब वो अपनी काबीलियत वाली किसी दूसरी औरत को उनसे ऊँचे पायदान पर पाती है ... जाहिर है ये एक औरत की चिढ़ तो बिल्कुल भी नहीं ... पर वो कुंठा जरुर है ... जो किसी ना किसी आभाव के चलते उसे उसके सपने से दूर ले गयी थी... उसकी डिग्रियाँ सिर्फ कागज़ का टुकड़ा बनकर बक्से के किसी कौने में सिमट गयीं ....और वो " चौके " की दीवारों तक... 

इत्तेफाक से " ये बड़ी डिग्री वाली औरत " आपके घर पर भी जरूर होगी ... नाम कोई भी हो ... मम्मी,मासी,बुआ,चाची,ताई,मामी ,नानी भाभी ,बहन ... पर उसने शायद ही कभी उलाहनों में उस डिग्री का जिक्र किया हो !!! 

बात आने पर या तो मुस्कुराकर कहा होगा " अरे कहाँ ... घर में इतना काम,बच्चे ,ये ... इसी से समय नहीं "

या फिर ... " परिवार ,पैसा ,पति " को लेकर एक आपबीती के जरिये अपने सपने मरने की बात स्वीकारी होगी ...

जो भी हो ... " एक समय जरुर आता है जब अंतर्मन की कसक उसे याद दिलाती है कि वो भी कुछ बन सकती थी ,कर सकती थी " ... पर उस कसक को वो उसी कमरे में छोड़कर बाहर आ जाती है घर का पड़ा हुआ काम समेटने 

 सपने बिखरे तो क्या हुआ ! उसे तो घर समेटना है ...

Pooja Vrat Gupta

( Freelancer & Blogger ).                    

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