मैं खुश हूं मैं एक बेटी की माँ हूं।
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|   Aug 01, 2017
मैं खुश हूं मैं एक बेटी की माँ हूं।

जब मुझे पता चला था की मैं माँ बनने वाली हूँ, मैंने बस भगवान से प्राथना करना शुरू कर दिया कि हे भगवान मुझे प्यारी सी बेटी देना जिसके प्यारी सी मुस्कान हो,गुंगराले बाल हो,गुलाबी गाल हो,बड़ी बड़ी आंखें हो।मैं रोज़ यही प्राथना करती थी।

और भगवान ने मेरी सुन ली और मुझे प्यारी सी बेटी भी दी। पहली बार उसे देख के लगा झट से उसे अपनी गौद में ले लूं। लेकिन जब उसे पहली बार गौद में लिया तो मेरे आंखों से आँसू निकलने लगे,अजीब सा दर्द अजीब सी खुशी,और एक डर भी लगा। ऐसा लगा कि अभी तो सिर्फ जन्म ही दिया है,अभी माँ बनना तो बाकी। परी जैसी लग रही थी,गुलाब के पंखुड़ियों जैसे होठ,गुलाबी गाल,लंबी आंखे,उसे देख के मैने सोचा हे भगवान बेटी तो मांग ली लेकिन इसकी परवरिश कैसे करूँगी,इसे कैसे समझूँगी,कैसे समझाऊंगी,कैसे सही गलत बताउंगी।

लेकिन अगले ही पल मुझे लगा सब हो जाएगा, मुझे धैर्य से काम लेना होगा, पहले तो अपनी बेटी को तो अच्छे से समझ लूं।

उसका रोना,हँसना, खिलखिलाना,उसकी किलकारी सब देखते देखते कब वो अपने पैर पे चलने लगी पता ही नही चला। फिर मेरी परेशानी बढ़ने लगी। मैं सोचने लगी जब तक ये मेरी बेटी मेरे गौद में थी तब तक सेफ थी,अब चलने लगी है, दौड़ के इधर जाएगी, उधर जाएगी, मैं कैसे हर पल उसके साथ रहूंगी। फिर वो थोड़ी ओर बड़ी हुई,मेरी चिंता और ज़िम्मेदारी और बढ़ने लगी,मैं उसे सिखाने लगी,किसके पास जाना है, किसके पास नही जाना है, सबके सामने कपडे नही उतारना है, नहाते समय पैंट पहनना है,और पता नही क्या।

सबसे ज़्यादा डर मेरे दिल मे तब आया जब मैं उसका एड्मिशन करवाने स्कूल गयी, बिना झिझक के मैंने प्रिन्सिपल से अपनी बेटी के सेफ्टी के बारे में पूछ लिया।उन्होंने आश्वासन दिया की मेरी बेटी सेफ रहेगी।

लेकिन मेरे अंदर की माँ की तो जैसे तस्सली ही नही होती,जब भी मेरी बेटी स्कूल से या बाहर से घर आती,तो मैं उससे पूछ्ने लगती क्या किया,किसने क्या बोला, और अगर कोई दाग या चोट दिख गया तो जैसे मेरी जान ही निकल जाती है,मैं उससे पूछने लगती हूं, ये कैसे हुआ ,किसने किया।अभी मेरी बेटी 5 साल की और फिर भी अगर वो अपने क्लास में पढ़ने वाले किसी लड़के के बारे में कहती है कि वो साथ खेलते है तो मैं डर जाती बिना य सोचे कि वो लड़का भी तो 5 साल का ही होगा और मेरी बेटी के जैसा ही मासूम होगा।शायद मैं "लड़का"शब्द से डर जाती हूं।

अपनी बेटी के पास किसी ग़ैर अंकल या फ़िर किसी मुँह बोला भाई की नही आने देती क्योंकि मुझे किसी पे भी भरोसा ही नही होता।

ये डर सिर्फ मेरे अंदर ही है कि सब बेटी की माँ ऐसी ही होती है।

ख़ैर अभी तो शुरुवात है, अभी तो मेरी बेटी धीरे धीरे बढ़ रही है,और शायद मैं भी धीरे धीरे बढ़ रही हूं।माँ बनने के प्रक्रिया मे अभी भी हूँ।

मुझे साथ कि ज़रूरत है ,अपनी बेटी के साथ कि ज़रूरत है।वो मुझे समझे और मैं भी उसे समझूँ।

एक माँ के डर को उसके दिल से उसकी बेटी ही निकाल सकती है।

प्प्रेगनेंसी के तो 9 महीने होते हैं, पर माँ बनने के लिए समय सीमा नही है,जबतक रहूंगी ये प्रक्रिया चलती ही रहेगी।

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