फॅमिली कोर्ट में पहला पदापर्ण
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|   Mar 01, 2017
फॅमिली कोर्ट में पहला पदापर्ण

एक अजीब सी मायूसी, हताशी से ग्रसित रिया ने जब कोर्ट में अपना पहला कदम रखा तो अनायास ही उसकी आँखें छलछला गयीं, इसलिए नहीं क्यूंकि वो कमज़ोर महसूस कर रही थी, परन्तु शायद इसलिए क्यूंकि रिश्तों ने उसे फिर एक बार निराश कर दिया था. जाने क्यूँ कोर्ट में वकील के ऑफिस में बैठना उसको शर्मिंदगी दे रहा था और उसे ऐसा लग रहा था मानो सबकी आँखें बस उसी को घूर रही हों, और उसने कोई अपराध कर दिया हो.

नज़रें नीची करके जब वो बैठी थी तो उसे महसूस हुआ की कोई अत्यंत ध्यान से उसके चेहरे पर भावों को पढ़ रहा है, सर उठाने पर देखा तो पाया की उसके पिता की नज़रें उसकी आँखों में छिपे दर्द को समझ रहीं हैं और उनकी आँखों के कोनो से वो छलकती हुई पानी की बूँदें मानो सब कुछ कह गयीं. उनके चेहरे पर एक याचना थी जो मानो कह रही थी, “बेटी मुझे माफ़ कर दो, मै तुम्हे चाहकर भी इस पीड़ा से नहीं बचा पाया. काश! मै कुछ कर पाता,”

वो एक घंटा जो रिया ने कोर्ट में गुज़ारा उसमे वो बस यही सोचती रही, “मेरी गलती क्या थी?” मै ज़िन्दगी के इस दोराहे पर किसकी बदौलत आई? वो इंसान जो मुझे निरंतर छलता रहा, मेरी आत्मा को सालता रहा वो सही और मै गलत? क्यूँ?? क्यूंकि मै अपने हक के लिए बोली? मैंने ये दिखाया दुनिया को, उन रिश्तों को की मै भी इंसान हूँ, बस करो अब बर्दाश्त नहीं होता. मुझे भी जी लेने दो.”

परन्तु ये कौन सा और कैसा समाज है जो एक औरत का दर्द नहीं समझता, उसकी सहनशक्ति नहीं देखता, उसकी पीड़ा नहीं परखता, बस अपना फैसला सुना देता है और कैसे होते हैं ये ससुराल जो बहु को लक्ष्मी समझ कर घर में लाते तो हैं पर उन्हें उसे बर्बाद करने में, उसे बेईज्ज़त करने में, एक सेकंड नहीं लगता अगर वो उन दिखावटी अपनों के सामने सच्चाई का युद्ध करे. ये कैसा समाज है जो लड़की को उसके अपनी माँ के घर से पराया कर देता है? और कैसे हैं वो नियम जो उसको अपनों के बीच पराया महसूस कराते हैं?

“और भले ही मैंने कोर्ट में आज कदम रखा हो , पर लड़ तो मै तब से रही हूँ जबसे ये फैसला लिया की अब साथ नहीं रहना और नहीं जीने एक आधी अधूरी, डरी हुई ज़िन्दगी जिसमे सिर्फ ज़लालत और बेईज्ज़ती थी. आसान तब भी नहीं थी, आज भी नहीं है और आगे भी नहीं होगी पर हाँ अपने फैसले से सुकून महसूस करती हूँ, की शायद कुछ सही काम किया है, एक कदम बढाया तो है, भले ही लडखडाता सा.”

रिया जब कोर्ट से वापिस निकली तो उसके चेहरे पर एक आत्मविश्वास की मुस्कराहट थी, उसकी आँखों में एक गर्व था की हाँ मै अपने दो बच्चों के हक के लिए यहाँ आई हूँ, वो दो बच्चे जिनके अनगिनत फ़ोन आ चुके हैं, जो बेसब्री से अपनी माँ के लौटने का इंतज़ार कर रहे हैं, क्यूंकि दोनों के लिए जो भी है, माँ ही तो है!

इसी आत्मविश्वास की मुस्कराहट से उसने अपने पिता की और देखा मानो कह रही हो, “मै आपके साथ हूँ, आप परेशान न हो, ये मेरी लड़ाई है और मै इसको पार करके रहूंगी. बस आप और माँ साथ मत छोड़ना, जिंदा रहने का हक हम मिलकर तलाश लेंगें. कहीं कोई फिजा, कोई आसमान तो मेरे हिस्से का भी होगा!”

और निकलते निकलते, कहीं दूर आवाज़ आई, ये सफ़र बहुत है कठिन मगर, न उदास हो मेरे हमसफ़र...

 

 

 

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