आखिर किसकी मर्जी से तुमने माँ होने का हक मुझसे छीन लिया?
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|   May 26, 2017
आखिर किसकी मर्जी से तुमने माँ होने का हक मुझसे छीन लिया?

अपने 18 साल के बेटे निशान्त को हास्पिटल मे देखकर आरती का शरीर बिल्कुल शिथिल पड़ गया था। निशान्त पल पल मौत की तरफ बढ़ रहा था। सारे रिश्तेदारो का रो रोकर बुरा हाल हो गया था पर आरती तो बेसुध सी हो गई थी जैसे वो किसी और दुनिया मे चली गई हो पर उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान देखकर सब हैरत मे थे,कोई नही समझ पा रहा था एक माँ की इस तड़प को। आरती ने अपना हाथ अपने पेट पे रखा और निशान्त का बचपन ढ़ुढने लगी,मानो कल की ही बात हो।

आरती खुद को कितना कोसती थी ,माँ ना बन पाने का दर्द बहुत ही बुरा होता है पर यहाँ तो बेचारी आरती उससे भी बड़े तकलीफ से गुजर रही थी । आरती दो बार प्रेगनेन्ट हुई और दोनों ही बार किसी ना किसी वजह से उसका मिसकैरेज  हो गया। कितनी कड़वाहट भर गयी थी उसके घरवालों के मन मे उसके लिए। बहुत ही मन्नतों के बाद खुशियों ने दस्तक दी और माँ बनने का सपना 6 साल के लम्बे इन्तजार के बाद आखिर पूरा हुआ और उसकी सूनी कोंख भर गई ।

सब बहुत खुश थे और आरती तो जैसे खुशियों के चरम पर थी।जब निशान्त ने पहली बार उसे माँ कहकर बुलाया तो उसके पूरे शरीर मे एक लहर दौड़ गयी और आँखें तो पूरे दिन छलकती रही। वक्त बीता और निशान्त बड़ा हो गया,बहुत होशियार था वो पढ़ने में पर उतना ही संवेदनशील भी  और आरती इस बात को अच्छी तरह जानती थी। स्कूल की पढ़ाई के बाद वो बाहर चला गया अपने डाक्टर बनने का सपना पूरा करने और इधर आरती का दिल बैठा जा रहा था। पहले कुछ महिने सब ठीक रहा पर फिर जाने क्या हुआ उसके नम्बर कम आने लगे वो बहुत परेशान रहने लगा तो आरती ने उसे वापस बुला लिया और उसको समझाया कि उसके बेटे से बढ़कर उसके लिए कुछ नही है। आरती ने उसको डाक्टरी की तैयारी छोड़कर ग्रेजुएशन करने की सलाह दी पर वो खुश नहीं था। कुछ दिन घर पर बिताने के बाद उसने आरती और बाकी घरवालों से फिर एकबार तैयारी करने की इजाजत ली। आरती का मन बिल्कुल भी नहीं था उसे खुद से दूर भेजने का फिर उसे लगा कि कहीं बेटे के लिए उसकी ममता उसे स्वार्थी तो नहीं बना रही और यही सोचकर भारी मन से उसने अपनी सहमति दे दी।

एक रात निशान्त का फोन आया और वो कुछ परेशान लग रहा था। एक माँ अपने बच्चे के मन को किसी भी स्थिति में भाँप लेती है और यही हुआ आरती के साथ,उसका मन बेचैन हो गया। वो अगले ही क्षण निशान्त के पापा के साथ उसके हास्टल के लिए निकल गई। अगले दिन वहाँ पहुँचने के बाद तो उस पर पहाड़ टुट पड़ा जब पता चला कि निशान्त ने रात मे ही कोई ज़हरीली चीज खा ली है और हास्पिटल मे है। वो भागते हुए हास्पिटल पहुँची तो पता चला कि उसके पूरे शरीर मेंं जहर फैल गया है और उसे बचाना मुश्किल है फिर भी डाक्टर पूरी कोशिश कर रहे थे उसे बचाने की। तबतक सारे रिश्तेदार भी आ गये थे।

दो घंटे बीत चुके थे और आरती अभी भी बेसुध होकर यही सब सोच रही थी कि तभी उसके पति उसके पास आए और उनकी आँसू से भरी आँखों ने आरती को बता दिया कि आज उसकी कोंख एकबार फिर उजड़ गयी। आरती उठी और अपने बेटे के बेजान शरीर को एकटक देखने लगी । फिर एकदम से बोल पड़ी

"तुम मेरे पेट में थे नौ महीने तक,कोई दुकान तो नहींं चला रहे थे फिर भी जिए। हाथ-पैर भी नहीं थे जो खाना खा लेते फिर भी जिए। साँस लेना भी नही जानते थे फिर भी जिए,आखिर तुम्हारी मर्जी क्या थी फिर किसकी मर्जी से जिए?फिर मेरे कोंख से जन्म लिया तुमने और उसके पहले ही मेरे स्तनो में दूध भर आया किसकी मर्जी से?

माँ के पेट में तो माँ के ही साँस से काम चलता था पर जैसे ही तुम बाहर आए तुमने तुरन्त साँस ली,किसी पाठशाला तो गये नहीं तुम फिर किसने सिखाया कि कैसे साँस लेनी है?

किसने तुम्हें जीवन की सारी प्रक्रियाएँ दी हैं? जब तुम थक जाते हो तुम्हें कौन सुला देता है और कौन तुम्हारी नींद पूरी हो जाती है तो तुम्हें उठा देता है? 

इतनी विराट दुनिया जिस स्रोत से चल रही है, एक तुम्हारी छोटी—सी जिंदगी उसके सहारे ना चल सकेगी? कहीं तो कोई व्यवधान नहीं है, सब सुंदर चल रहा है,सब बेझिझक चल रहा है। तुम छोटे से अंश हो इस दुनिया के, फिर तुम्हें यह भ्रांति कब से आ गयी कि तुम्हें खुद को अलग से चलाना पड़ेगा? तुम्हें अपना जिम्मा अपने ऊपर लेना पड़ेगा?और ये सब कहकर आरती एकबार फिर बेसुध हो गयी,एकबार फिर उसकी गोद सूनी हो गई थी।

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