अरे सर छोड़ दीजिये हमें, मत मारीए हमें तो लडकियों ने खुद बुलाया था मिलने के लिए..
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|   May 22, 2017
अरे सर छोड़ दीजिये हमें, मत मारीए हमें तो लडकियों ने खुद बुलाया था मिलने के लिए..

अभी कल की ही खबर है कि यूपी के मुजफ्फरनगर में बजरंग दल के लोगों ने दो युवको को बड़ी ही निर्ममता से कपड़े उतार कर बेल्ट से पीटा।

बजरंग दल वालों का कहना था कि ये लड़के दो लड़कियो को छेड़ रहे थे। अब भई अगर ऐसा है फिर तो बजरंग दल तारीफ के काबिल है,हम सब यही सोच रहे होंगे और क्यों ना सोचा जाए आजतक लड़के यही तो करते आए है,लड़कियों की सम्मान को तार तार करते और समाज मे अपना रौब जमाते।

लेकिन ये क्या जब उन लड़कों से पूछा गया कि वो उस जगह पर क्या कर रहे थे तो उन्होंने ने बताया कि वो लड़कियां उनकी फेसबुक पर दोस्त हैं और उनके बुलाने पर ही मिलने आएं हैं। हो सकता हो लड़के झूठ बोल रहे हों पर क्या बजरंग दल को वहाँ पर लड़कियों से पुछताछ नहीं करनी चाहिए थी? मेरे हिसाब से तो बजरंग दल वालों को उन्हे पुलिस के हवाले कर देना चाहिए था या तो लड़कियों का फेसबुक देखना चाहिए था कि वो लड़के उनके दोस्त हैं या नहीं. क्योंकि एक पक्ष की बात सुनकर हम किसी को बीच सड़क पर पीट नहीं सकते।

सालों से हम पुरूषवादी समाज मे बहुत कुछ सहते हुये आगे बढ़े है और आज पुरूषों के बराबर या देखें तो कुछ क्षेत्रों में उनसे भी आगे है़ं और शायद यही वजह है कि जब भी हम कुछ ऐसा सुनते हैंं तो जी भर के लड़कों को कोसते हैं और पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष निकाल लेते हैंं।

लेकिन पिछले दो-तीन साल से अगर देखें तो हर तरफ नारीवाद का बोल बाला है और ये हम महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक जीत है पर देंखे तो समस्या अभी भी है. अभी भी कहीं पुरुषवाद भारी पड़ रहा है तो कहीं नारीवाद के अधिकारो का गलत फायदा उठाया जा रहा है।

हम उन खबरों को बहुत ध्यान से देखते और सुनते है जहाँ महिलाओं के सम्मान का हनन हो रहा है पर जहाँ पुरूषों के सम्मान का हनन हो रहा है उसका क्या?

हम खबरों में ये भी देखते हैं कि कैसे एक पत्नी ने किसी और के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी, जायदाद के लिए अपने ही पिता या ससुर की हत्या कर दी यहाँ तक कि एक बहन अपने ही भाई की हत्या कर देती है किसी लड़के के लिए पर थोड़ी ही देर में नारीवाद फिर जाग उठता है और वो खबर धुँधली हो जाती है. हम महिलाएँ सशक्त है फिर भी "ladies first" वाले शिष्टाचार की उम्मीद हर जगह आज भी रखते हैं चाहे वो यात्रा के दौरान बैठने की बात हो या कहीं लाइन मे लगने की। "मेरे विचारों से अगर किसी को ठेस पहुँची हो तो उसके लिए माफी चाहूँगी पर मैं यही कहना चाहूँगी कि हमें अपनी दोनों आँखें खोलनी होंगी और ये समझना होगा कि सम्मान शब्द पर सिर्फ हम महिलाओं का एकाधिकार नहीं है. सम्मान और आबरु महिला और पुरूष दोनों से जुड़े हैं। हमें गलत के खिलाफ आवाज उठानी है फिर चाहे वो महिला के लिए हो या पुरूष के लिए क्योंकि सबसे पहले हम एक मनुष्य हैं और मानवता एक महिला और पुरुष मे भेद नहीं करती."

एक दूसरे के बिना हम दोनों का ही आस्तित्व सम्भव नही है, वैसे भी हम तो बराबर का हक चाहते हैं समाज में तो ये पुरूषवाद और नारीवाद की क्या जरूरत है?

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