आदर्श जीवनसाथी...  
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|   Jul 22, 2017
आदर्श जीवनसाथी...  

कृति को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले हैं। सारा घर व्यवस्थाओं में लगा है जैसे वो कृति को नहीं घर को देखने आने वाले हैं। सभी की धड़कन बढ़ी हुई है। सभी यही प्रार्थना कर रहे हैं कि रिश्ता पक्का हो जाए। क्यूंकि लड़का (दीपक) संपन्न परिवार से है और कृति को बहुत खुश भी रखेगा साथ ही उन लोगो की कुछ मांगे भी नहीं हैं। 

लेकिन कृति कोने में मुरझाई सी एक ओर बैठी सबको देख रही थी। वह एक मध्यम वर्ग के परिवार से थी और उसके सपने भी मध्यम परिवार के ही थे। वह चाहती थी कि उसका जीवनसाथी भी मध्यम वर्ग से हो जिसके साथ वह जीवन के संघर्षों का सामना करेगी। जीवन के सभी सुख दुख, उतार चढ़ाव साथ में झेलेंगी, तभी तो उनका दाम्पत्य सुदृढ़ बनेगा जैसा कि माँ बाबूजी का है। लेकिन माँ बाबूजी ने तो उसके विपरीत संपन्न परिवार का लड़का पसंद किया है, जहां एक सजी धजी गुड़िया के रूप में उसे रहना था। कोई भी कृति से उसकी पसंद नहीं जानना चाहता। अंतिम निर्णय लड़के वालों का ही होगा। कृति इन ख्यालों में खोई हुई थी की माँ की पुकार से उसके विचारों की धारा टूट गई - 'बिट्टो किस सोच में पड़ी है जा तैयार हो कर आजा वो लोग आते ही होंगे और सुन वो लाल रंग की साड़ी पहनकर आना, उसमें तेरा रंग निखर के आता है।.... बस बिट्टो वो लोग तुझे पसंद कर ले और तु भी एक ख़ुशहाल परिवार में चली जाए तो हमारे भी सारे सपने पूरे हो जाएंगे।' इतना सुनके कृति अंदर तैयार होने चली गई। 

कुछ ही देर में एक गाड़ी हॉर्न देती हुई दरवाजे पर रुकी। सभी लोग दरवाजे की ओर दौड़े और माँ, चाची बैठक की तरफ चली गयी। कृति अपने कमरे में साड़ी ठीक करने लगी थी कि तभी उसकी छोटी बहन आई और बोली 'वाह दी लड़का तो बड़ा हैंडसम है, देखने में ही बड़े घर के लगते हैं। आपकी तो किस्मत ही खुल जाएगी। पता है उसके साथ उसके भाई भाभी आए हैं और सभी अपनी कार से आए हैं।' ये सब सुनकर कृति की धड़कन और भी बढ़ गयी कि इतने बड़े लोग हैं, कहीं उसे नापसंद कर दिया तो। तभी चाची जी ने कृति को नाश्ते की ट्रे पकड़ा दी और अंदर जाने को कहा। कृति सहमी सी बैठक में पहुची। नाश्ते के दौरान दीपक के भाई भाभी कृति से बातें करने लगे लेकिन दीपक चुपचाप बैठा रहा। कृति ने दीपक को तिरछी नजरों से देख लिया था। सभी की बातें होने के बाद कृति बाहर आ गयी। उन्होंने खाना खाया फिर बोला कि हम बात करके थोड़ी देर में जबाब देते हैं। 

सभी कमरे से बाहर आ गए और वो लोग फुसफुसाने लगे। हम सभी परेशान थे कि क्या जबाब देंगे, माँ कोने में खड़ी भगवान् से प्रार्थना करने लगी। फिर थोड़ी देर बाद उनकी भाभी बाहर आई। उन्होने कहा कि दीपक अकेले में कृति से कुछ बात करना चाहता है, अगर आपको ठीक लगे तो ये दोनों ऊपर के कमरे में बात कर सकते हैं। माँ उनके जाने के बाद बड़बड़ाने लगी- 'अकेले में क्या बात करनी है जो बोलना है सबके सामने बोले। तब से तो मुंह भी नहीं खोल रहा था अब क्या बात आ गयी, नहीं पसंद लड़की तो मना कर दें ये कौनसी तहजीब है।'बाबूजी माँ को आंख दिखाने लगे तो माँ रसोई की तरफ चलीं गयीं।

 सभी चुप खड़े हो गए जैसे कोई सन्नाटा पसरा हो। थोड़ी देर बाद कृति ने कुछ सोच कर बोला कि मैं उनसे मिलूंगी, आप उन्हे बुला लीजिए। सभी कृति को देख रहे थे। कृति रवि को लेकर ऊपर के कमरे में चली गयी। दीपक ने बोला -' माफ कीजिएगा, अगर आपको अकेले में बात करना बुरा लगा हो तो, लेकिन ये हमारे जीवन का सवाल है। देखिए कृति जी अभी तक जो भी बातें हुई हैं वह आपके परिवार और मेरे भैया भाभी के बीच में ही हुई है। लेकिन मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं। जैसा आप सभी को दिख रहा है वैसा कुछ नहीं है। मेरे माता पिता कुछ समय पहले नहीं रहे उनके बाद मैं भाई भाभी के साथ रह रहा हूँ। भैया की शादी पिताजी ने पहले ही कर दी थी और उस समय मेरी पढ़ाई चल रही थी। उसकी जमा पूंजी से ही मैंने पढ़ाई पूरी की जिसके बाद एक कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई। जिस मकान में हम रहते हैं वह मेरे भाई भाभी का है। यह ऐशो आराम की जिंदगी भी उनकी अपनी कमाई हुई है और मैं उनकी इस दुनिया से अलग हूं। अभी तक उनके स्नेह ने मुझे अलग नहीं रहने दिया लेकिन शादी के बाद मैं उनसे अलग रहना पसंद करूंगा। मेरे पास एक नौकरी है जिसमें मैं आपको खुश रख सकता हूं। हमें अपनी नई दुनिया ख़ुद बसानी है। आप पढ़ी लिखी है और मैं यहीं उम्मीद रखता हूं कि आप भी मेरे जीवन के संघर्षों में मेरा साथ दे। अभी तक मैंने जितनी भी लड़किया देखी, वो मुझे बिना गाड़ी बंगले के स्वीकार करने को तैयार नहीं हुई। अगर मेरा प्रस्ताव अापको पसंद हो, तभी हां करिएगा। मेरी तरफ से हां समझिए। अब निर्णय आपको लेना है। अगर आप मेरा साथ देंगी तो मैं खुद को खुशकिस्मत समझूंगा। ' इतना कह कर दीपक नीचे चला गया। कृति कुछ देर वहीं बैठी रही। उसका सपना आज पूरा हो रहा था। अंतिम निर्णय उसे ही लेना था। उसे दीपक की ये सब बातें भा गई थी। उसका चेहरा खिल गया था। इतने में दौड़ती हुईं चाची जी आई। उन्होने कृति का चेहरा पढ़ लिया और बोली 'तो हम तुम्हारी हां समझे।'  कृति ने ये सुनकर  हामी भरी और चाची जी से लिपट गयी।

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