सांस कैंची सी चलती रही, उमर कपड़े सी कटती रही !
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|   Jul 13, 2017
सांस कैंची सी चलती रही, उमर कपड़े सी कटती रही !

20 से 30 का जो शुरूआती स्ट्रगल होता है, वो समाज में acceptability बनाने वाला ज्यादा होता है। ऐसा क्या कर दूँ कि रिश्तेदार/पड़ोसीयों में धाक जम जाए। फ्रेंड सर्किल में साबित कर दूँ कि ग्रेड या स्टार्टिंग पैकेज से कोई फर्क नहीं पड़ता। बढ़िया कपड़े पहनूँ.. बढ़िया जगहों पे बैठ लंच/डिनर करूँ.. और हर महीने एक नए लुक और एक नए बैकग्राउंड के साथ बढ़िया सी सेल्फी अपडेट हो..ताकि अमेरिका/यूरोप में सेटल बैचमेट देख पाएं कि इधर भी मौज कम नहीं है।  27-28 पहुँचते पहुँचते उत्साह थोड़ा कम होता है और वास्तविक जीवन सामने आने लगता है। अक्सर रातों को साँसे वैसे ही थमने लगती हैं जैसे पहली बार रात के वक़्त कोलाहल करती नदी के पानी की आवाज सुनके थमती हैं। 

लड़कपन बाकी है तो वास्तविकता को टालने के लिए जो हो सकता है तुम वो सब करते हो। दिखावा शुरू करते हो कि तुम mature हो गए हो। काली/ग्रे टी शर्ट की जगह चेक की शर्ट पहनने लगते हो। थोड़ी सी दाढ़ी रखने लगते हो। तुमको लगता है कि सीरियस चेहरा बना लोगे तो वास्तविक समस्याओं से लड़ने लायक हिम्मत ला पाओगे।

ख़ैर 30 भी पार हो ही जाता है..रिश्तेदार/सामाजिकता जिसे इम्प्रेस करने के लिए तुम अब तक अपने कैरियर डिसीजन/पर्सनल डिसीजन लेते आये थे..उनकी लाइफ में आप अचानक exist करना बंद कर देते हो। उन्होंने अपने नए शिकार ढूंढ लिए होते हैं। वो फिर किसी 18-20 साल के बच्चे पे अपनी कुंठाएं निकाल रहे होते हैं।

आप रियलाइज करते हो कि उनको इम्प्रैस करने के चक्कर में जो पहाड़ तुम चढ़ गए हो..तुम्हें तो यहां होना ही नहीं था।

31वें जन्मदिन तक आते आते जो acceptability वाला स्ट्रगल था वो existence/सर्वाइवल का स्ट्रगल बन जाता है। 

अब आप किसी से उम्मीद नहीं रखते..न बर्थडे विश की..न किसी जगह invite करने की..न किसी ख़ुशी/दुःख में शामिल होने की। अब तारीखें/दिन याद नहीं रहते।

अब एक पहाड़ पे आप हैं..दूसरा पहाड़ वो हैं जहाँ तुम्हें होना चाहिए था..अब जो रास्ता तय करना है..इसी सफर का नाम जीवन है.

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