अरमानों की होली...
16459
23
1
|   Feb 10, 2017
अरमानों की होली...

मैं बिंदिया; उम्र पैंतीस, रंग गोरा ,कद पांच फूट छ इंच, शरीर छरहरा,  गुमशुदा हूँ | कुछ दिनों से, या महीनों- सालों से मैंने खुद को नहीं देखा| हर जगह ढूंढा, हर किरदार में खोजा, कभी पत्नी मिली तो कभी माँ; कभी बहू तो कभी भाभी पर मैं हर कोने  से नदारद थी| सोचा एक कोशिश और करलूँ; शायद आप ने ही मुझे इन दिनों कहीं देखा हो|

नाम के साथ ही माँ- बाउजी ने सुहाग के सपने जोड़ दिए थे और मैं पगली वस्तविकता से परे उन्ही सापनों में आपना सुनेहरा भविष्य खोजने लगी| रंग मुझे बचपन से ही लुभाते थे और शायद इसीलिए मैं होली का इंतज़ार बड़ी ही बेसब्री से करती| अच्छी तरह से याद है मुझे उस होली का वह रंगीन, खुशमिजाज़ माहौल जब हम पहली बार मिले थे... आये तो वे मुझे देखने थे, पर वो अहसास पहली नज़र के प्रेम से कुछ कम नहीं था| बादलों में होली के गुब्बार ने मेरी दुनिया जैसे एकाएक इंद्रधनुषी कर दी और मैं  आँसुओं के साथ आँखों में सतरंगी ख़वाब  लिए आपने ससुराल विदा हो गयी|

नया घर, नए रिश्ते; साबकुछ रातोरात बदल गया| मैं, अब एक ज़िम्मेदार बहु की तरह आपनी सारी सुझबुझ से घर सँभालने और संवारने में जुट गयी| वक़्त गुज़रता गया, पति का साथ और सहयोग ही मेरी ताकात थे और उनका प्यार  दो संतानों के रूप में मेरी खुमारी बढ़ा रहे थे| अब एक माँ थी मैं, जो सिर्फ अपने बच्चों के बारे में सोचने पर कटिबद्ध होती है| मेरी पसंद नापसंद अब मुझे कहाँ याद थी? पहनावा 'उन' के मन का, रहन सहन ससुराल के अनुरूप, खान पान जो बच्चे और बाकी लोग छोड़ जाये, घूमना सास के साथ मंदिर या फिर नौकर के संग सब्जीमंडी; यही मेरी दिनचर्या बन गयी थी| इन सरे फेर बदलावों से जूझते हुए  मैं कब 'इन' से दूर होती चली गयी इस का इल्म ही नहीं हुआ|

धीरे धीरे ज़िन्दगी से जैसे सारे रंग उड़ने लगे| मैं अब अपना अस्तित्व, अपना नाम, अपना स्त्रीधर्म दाव पे लगा मेहसूस कर रही थी| कुछ अजीब सी घबराहट जान पड़ती थी मनो हर पल कुछ छीन जाने का डर या किसी अनहोनी के निकट होने की संभावना तीव्र होती जा रही हो| मुझे उन पर अविश्वास नहीं था, शायद अब मैं ख़ुद ही निर्जीव हो चुकी थी, चिज़ो में अरुचि सी होने लगी थी; हर लम्हा फीका सा दीखाई देता था| कभी बेवजह चिड जाती, तो कभी अपने आंसुओं को पोंछ हंसी के मुखौटे से हर दर्द छुपा लेती| अपने बेटे को बहेन पर रॉब झाड़ता देखते ही टोक देती, पर जब कभी अपनी बिटिया  को खिलखिलाते हुए देखती तो एक डर से कांप उठती की वह भी जल्दी ही बड़ी हो जाएगी और उसे भी मेरी ही तरह अपनी खुशियों को अपनी जिम्मेदारियों पर लूटाना होगा और तब मैं चाह कर भी कहाँ कुछ कर पाऊँगी उसके लिए| क्यों सही कहा ना? यही तो होता है हर स्त्री के साथ, कहाँ जोड़ पाती है वह उम्रभर का विशवास, आपनी मर्ज़ी की ज़िन्दगी का ह़क कब नसीब होता है उस बदनसीब को? कहीं ऊँची आवाज़ से दबा दी जाती है तो कभी ताकतवर बाजुओं से मसल दी जाती है|

हर मोड़ पर आकरी कसौटियों को मात देकर आगे बढ़नेवाली औरत, रिश्तों की उलझनों में जकड़ी अपनेआप से ही हार जाती है| ज़िन्दगी एक पहेली सी मालूम होने लगती है और बेबसी में मेरी तरह खुद को  ही खोजने की नौबत को न्योता दे बैठती है| अब आईने में अपना अक्स भी भिन्न लगता है मुझको जैसे किसी फैंसी ड्रेस की रहेर्सल का एक हिस्सा हो|

 मौसम बदल रहे हैं| होली आ रही है, कुदरत को फिर ठिठोली सूझ रही है, पर मुझ जैसी आंखोंवाली आंधी को अब रंगोंसे फर्क नहीं पड़ता| मुझे तो इंतज़ार है इस साल होली के जलाए जाने का जिसमे मैं अपने सारे गिले शिकवे झोंक दूँ ताकि ज़िन्दगी के बचे कुचे दिन सुकून से काट सकूँ; हर पल मौत के इंतज़ार में नहीं| इस दफाह त्यौहार पर रंग हलके होंगे, चेहरे सफ़ेद ,बादलों में कला धुआं, प्रचंड  तीव्र ज्वालाएँ, तपिश कुछ और ज्यादा होगी जब जलेगी मेरे आरमानों की होली||

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day