एक कदम सामाजिक स्वच्छता की ओर
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|   Jun 17, 2017
एक कदम सामाजिक स्वच्छता की ओर

आजकल स्वच्छता आंदोलन का सकरात्मक प्रभाव सभी ओर दिखाई दे रहा है।पहले जो उदासीन थे,वे भी इसमें आगे आए है।यह एक अच्छी पहल है।

अच्छी बात है कि आसपास की सफाई पर ध्यान दिया जा रहा है।एक तरह की पहल करने की आवश्यकता मुझे हमेशा लगती है और वह है कि सामाजिक स्वच्छता की ओर भी ध्यान दिया जाए।समाज में कितनी ही कुरीतियाँ,अंधविश्वास,रूढ़िवादिता अभी भी व्याप्त है और सुशिक्षित लोग भी इसका हिस्सा बने हुए है।सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है कि जो निकृष्ट सोच समाज में व्याप्त है उस पर नियंत्रण किया जाए।ऐसे ही कुछ समस्याओं को मैने दर्शानें का प्रयास किया है।

  • हम देखते है कि कुछ लोग अपनी सोच लोगो पर थोपते है जैसे कि अरे अपनी लड़कियों को इतना न पढ़ाइए;इनके लिए वर कहाँ से मिलेगा और आपकी बेटी ने अन्तरजातीय विवाह कर लिया तो आपकी कितनी बदनामी होगी।कितनी ही होनहार बेटियां इस सोच की बलि चढ़ चुकी है।
  • समाज में स्तरीकरण का बोलबाला है।उच्चस्तरीय लोग प्राय: अपनी स्थिति का लाभ उठाते है।निम्न स्तर के लोगों को अपने अधीन कर उनका लाभ उठाया जाता है।
  • कभी जब किसी लड़की के लिए रिश्ता आता है,तो अच्छा रिश्ता देखकर अपनी बेटी का नाम आगे कर देते है,व उस लड़की के लिए भ्रांतियाँ फैला देते है,जिसका रिश्ता आया था।वह और उस लड़की का परिवार बेवजह परेशान होते है।
  • कभी -कभी एक उच्चशिक्षित सुशील कन्या के लिए बेमेल रिश्ते पहुंचाए जाते है क्युंकि वह गरीब परिवार से है।उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाते है।
  • प्रतिस्पर्धा व जलन की भावना के कारण हम अपने ही समाज के लोगों का अहित करने से नहीं चूकतें।कोई किसी अप्रिय परिस्थिति से गुजर रहा हो तो भी कुछ लोग सांत्वना के बहाने उसके दर्द का उपहास करते पाए गए है।
  • अभी भी कुछ स्थानों पर लड़कियों की शिक्षा को गौण समझा जाता है।शादी के बाद बहुओं को किसी परिचारिका की तरह व्यवहार किया जाता है।उन्हें लंबा घूंघट करवाया जाता है,फिर भले ही वह उच्चशिक्षित हों।उन्हें पुरुषों के सामने मुँह खोलने की अनुमति नहीं होती है,भले ही आदमी गलत क्यों न हो।
  • बहुत से पुरुष अपने परिवार में अपनी पत्नियों के साथ गलत व्यवहार होते देखते है पर जड़वत बने रहते है।ऐसी महिलाएँ अक्सर कुंठा व अवसाद की शिकार हो जाती है।अगर वह खुद को खुश नहीं रखेंगी तो परिवार को कैसे खुश रखेंंगी।
  • हमें अपने परिवार में बेटे और बेटियों को एक सी शिक्षा देनी चाहिए।दोनों के साथ एक सा व्यवहार रखना चाहिए।क्योंकि यहीं से तो भेदभाव की नींव रखी जाती है।
  • अगर कभी किसी लड़की ने अपने माता -पिता की मर्जीके बिना प्रेम विवाह कर लिया है तो उसके दूसरे भाई बहनों के विवाह में परेशानी होती है जो कि असंगत है।
  • अगर कोई परिवार अपनी इच्छा से अपनी बहुओं को आगे बढा़ता है,उन्हें इच्छानुसार कपड़े पहनने देता है तो दूसरे लोगों को ये देखा नहीं जाता है।उन्हें अमर्यादित कह कर अपमानित किया जाता है।
  • अधिकतर मामलों में रिश्ता तय करते समय व्यक्ति का धन संपन्न होना ही प्रमुखता से देखा जाता है।इसके लिए लड़का या लड़की के उच्च गुणों की भी अनदेखी कर दी जाती है।प्रायः बाद में इनमें से बहुत से लोग पछताते भी है।
  • आखिर क्यों लोग गरीब परिवार की सुशील व सुशिक्षित कन्या की बजाय धनी परिवार की कन्या को ज्यादा महत्व देते है।ऐसा ही लड़को के साथ भी होता है।अधिकतर लोग धन संपन्नता को महत्व देते हुए अपनी कन्या को निर्धन सुयोग्य से ब्याहने की बजाय धनी युवक से ब्याह देते है।कभी -कभी ���से युवक बिगड़ैल साबित होते है।
  • आखिर क्यों हम अपने आसपास गलत होता देखते हुए भी चुप रहते है।हम इतने संवेदनहीन क्यों होते जा रहे है।क्या सामाजिक स्वच्छता भी हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है?
  • हम अपना आचरण स्वच्छ रखेंगें।मानवीय दुर्गुणों जैसे लोभ,मोह,द्वेष इत्यादि से दूर रहेंगे और नैतिकता के धरातल पर स्वयं को हमेंशा परखते रहे।औचित्यहीन व बेकार सी पंरपराओं का त्याग करे जो समाज की उन्नति में बाधक है;तभी हम एक स्वस्थ व स्वच्छ समाज का निर्माण कर पाऐंगें।

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