इतना आक्रोश क्यों पनपा है??
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|   Jun 27, 2017
इतना आक्रोश क्यों पनपा है??

पहली बार मैं जब उससे मिली,तो वह मुझे बहुत ही सीधी लगी।किसी से नजरे भी नहीं मिलाती थी।बस हाँ या न मैं बात करना और घर के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लेना।इतना हीं मिलना होता था,हमारा।माँ और पिता दोनों निजी कंपनियों में कार्यरत है।एक छोटा भाई है,उसका।एक नजर में तो समझ ही नहीं आता,ये लड़की अत्यधिक क्रोधी और जिद्दी है।अपनी बात मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।बड़ी होने के कारण उसे और जिम्मेदार होना चाहिए।

अचानक एक दिन मुझें उसके घर से कुछ आवाजे सुनाई दी,जो न चाहते हुए भी सुनाई दे रही थी।अपने पेरेन्ट्स से किसी बात पर बहस कर रही थी।बहुत जोर से चिल्ला रही थी।घर का सारा सामान उठा -उठा कर फेंक रही थी।दरवाजा पीट रही थी।बात सिर्फ इतनी सी थी कि दिनभर की थकान से त्रस्त होकर माँ ने कुछ शब्द समझाने के लिहाज से कह दिए थे।जो उसे बिल्कुल भी गँवारा न थे।मैं बहुत हैरान हुई,ये कौन सा रुप है,इसका?क्या इतना क्रोध दिखाना जायज था।

बहुत अलग सी लड़की है।कोई काम नहीं करना,नहाना धोना भी नहीं।अगर न बोलो तो सुबह से शाम एक ही जगह पर निकाल दे।माँ शाम को थकी हुई घर आती है फिर पूरे घर का काम करती है।कुछ कहती है,तो पूरा घर सर पर उठा लेती है;वह लड़की।मोबाइल और टीवी की दीवानी है।वह जो करती है,वही सहीहै।ऐसा दिखाती है।खाना पीना भी वक्त पर नहीं।

मुझे यह समझ नहीं आता कि। क्यों वह इतनी लापरवाह है।इतनी कृशकाय सी देह और गुस्से का अतिरेक कितना है।किसी और के लिए न सही अपने लिए ही थोड़ा तो सोचों,थोड़ा तो बदलो।बढ़ती उम्र के बच्चे तो ज्यादा सक्रिय होते है।

वह ऐसी है,तो कुछ लोग कहेंगें कि पेरेन्ट्स ध्यान नहीं दे पाए।उन्हे समय नहीं मिलता है।ऐसा नहीं है,वह उसे बहुत प्यार करते है,पर वह उनका अपमान करती है।आजकल सभी पेरेन्ट्स अपने बच्चों से मित्रवत व्यवहार करते है पर वह लड़की  उनसें अभद्र भाषा में बात करती है।।जो हम दोस्तों से नहीं कहते वह पेरेन्ट्स से कह जाती है।वह बेचारे अपने बच्चों के लिए ओवरटाइम करते है, ताकि ज्यादा पैसे कमाए जा सके।सोचिए क्या बीतती होगी उन पर?

पेरेन्ट्स का कसूर इतना ही नजर आता है कि उन्होने उसे ज्यादा लाड़ किया और कुछ बातें और आदतें अगर बचपन से स्वभाव में आ जाए तो बेहतर है।जो वे न कर पाए।वह दुबली पतली थी तो यह कहकर कि वह कमजोर है,उसे कोई काम नहीं करने दिया गया।बाहर खेल खेलने को प्रेरित नहीं किया गया,लिहाजा हीनभावना आना जायज है;जो कहीं न कहीं गुस्से के रुप में सामनें आती है।पेरेन्ट्स का दृढ़ होना भी बहुत जरुरी है।अब वह सबसे यह कहते फिरते है कि हमारी लड़की कोई काम नहीं करती,हमारी कोई बात नहीं मानती है।

अगर लोग यह कहें कि माँ-बाप दोनों के वर्किंग होने से बच्चों पर असर पड़ता है तो मैं पूर्णतया सहमत नहीं हूँ।मेरे पड़ोस में एक दूसरी फैमिली रहती है,जिनके भी दो लड़कियां ही है।माता -पिता दोनों वर्किंग है।बच्चों में काफी सहयोग की भावना है।उनकी माँ जब तक काम पर नहीं जाती उन्हे व्यस्त रखती है।जितना हो सके उनके लायक काम करवाती है ताकि उनमें आलस्य न पनपें।खेलने का मौका देती है।उनकी छोटी बेटी तो सिर्फ 6 साल की है जिससे वह अपना पर्स अरेन्ज करवाती है।काम की आदत डालना ही उनका अभिप्राय है।वे बच्चे कभी बद्तमीजी करते नजर नहीं आए।

मैं यह मानती हूँ कि कुछ बातों की आदत बच्चों में बचपन से ही डाल दी जाए तो बेहतर है।खुद की स्वच्छता का ध्यान रखना जिनमें सबसे ऊपर हो।सोचिए नहाने की आदत को टालना कोई अच्छी बात है क्या?उन्हे थोडे़ काम की आदत तो जरुर डाले���कल को कहीं बाहर पढ़ने जाना पड़े तो वे तैयार रहे।अच्छी किताबें पढ़ने की आदत डाले ताकि वे अच्छा आचरण सीखें।ऐसी न जाने कितनी ही बाते है,जिन पर ध्यान देना आवश्यक है।

अक्सर लोग बचपन से बच्चो को अत्यधिक परवाह दिखाते है।गलतियों को अनदेखा कर देते है।जो कि उनमें गलत आचरण को जन्म देता है।फिर बढ़ती वय के बच्चों को नियंत्रित करना मुश्किल होता है क्योंकि वे ज्यादा आक्रामक हो जाते है।लिहाजा जरुरी है कि सही समय पर उन पर ध्यान दिया जाए।

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