खुशियों का मोल...
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|   Aug 10, 2017
खुशियों का मोल...

कुछ लोग तो ऐसा ही सोचते है..कि जीवन भर की खुशियों को पैसों से बटोरा जा सकता है।आत्मसम्मान को दांव पर लगाकर सब लोग कैसे खुश रह सकते है..जो ऐसा समझते है कि ऐसा संभव है और ये उपाय निरापद है।हमने अपने आत्मसम्मान के लिए दहेज लोभियों को ठुकराते तो बहुत लोग देखे है..आज इसकी पेशकश करने वालों की गाथा भी सुन लीजिए।

जब तक ऐसे लोग है जो खुद दहेज देना पसंद करते हो,ये बुराई कैसे जाएगी... इस समाज से।व्यथित हूँ वह हालात देखकर जो मैने देखे है।हम क्यों अपनी कन्याओं को बोझ समझते है।

एक परिवार की कहानी आपके सामने रखना चाहूंगी उन महाशय की तीन कन्याएँ थी,पहली दो कन्याएं बहुत पैसे वाले घरों में ब्याही थी।रूपसी भी थी तो उनके ब्याह में शायद इतना दहेज न दिया हो।वे सज्जन अपनी तीसरी बेटी को भी बड़े घर में ब्याहना चाहते थे।अतः जोर शोर से वर ढूंढा जा रहा था....और कितने ही लड़के आते और लड़की देख कर चले जाते।बात कुछ जम ही नही रही थी।बात यह थी कि तीसरी कन्या बहुत ही औसत रंग रूप की व कम पढ़ी लिखी थी...पर वे सज्जन उसे इंजीनियर या डाक्टर से ब्याहना चाहते थे भले ही कितना पैसा देना पड़े।

एक दिन एक इंजीनियर बाबू आए..शादी की बात तो मान गए.. पर बात आ गई लेनदेन की..और मांग उठी 20 लाख रुपयों की..चूँकि वर पक्ष यह जानता था कि कन्या पक्ष वालों की गाँव पर जमीन है..भले ही वह पांच भाईयों में बंटने वाली हो।खैर जैसे तैसे बात पक्की हो गई।सगाई हुई... तिलक की रस्म में सात लाख रुपये रखे गये.. बाकि बाद में देने की बात हुई।अब ये तो वही जाने कि कैसे व्यवस्था हुई.. शायद उन्होंने अपने हिस्से की कुछ जमीन ही बेची हो...क्योंकि उनकी स्थिति इतनी भी अच्छी नही थी..पहले से ही मकान का कर्ज चल रहा था।इसके थोड़े ही दिनों बाद ही एक छोटा दिल का दौरा पड़ा...उन्हें।सोच सकते है कितना तनाव रहा होगा।

खैर कन्या का ब्याह हुआ.. और वह बड़ी ही खुश थी कि उसे अपने से ज्यादा सुंदर व पढ़ालिखा जीवनसाथी मिला....कहीं कोई शिकवा नहीं।चलिए मैं तो विचाररत हूँ.. अभी तक कि क्या दहेज देना वाकई खुशियों को खरीदने जैसा है।

 जो पैसा हम दहेज में दे देते है..उससे आधे में अपनी कन्या को उच्च शिक्षित कर सकते है जिसके बाद वह अपने पैरों पर खड़े होकर सम्मान के साथ जीवनयापन कर सकती है।अपनी शर्तों पर साथी चुन सकती है।उच्च शिक्षित कन्या समाज की प्रगति में भी सहायक होती है....मगर कौन समझाए इन दहेज देने वालों को...कि किसी कम पैसे वालें को भी अपनी बेटी दी जा सकती है..अगर वह अपने पैरों पर खड़ी हो..वह खुद सक्षम होती है बजाय कि उसे दहेज लोभियों को सौंपा जाए।

ऐसे घटनाक्रम सोचने पर मजबूर करते है व मन को झकझोरते भी है।

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