हम भाई बहनों की प्यारी यादें
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|   Aug 01, 2017
हम भाई बहनों की प्यारी यादें

JULY199 भाई बहन का रिश्ता सबसे अनोखा होता है यहां पर प्यार है तकरार है, लड़ाई झगड़े भी जमके होते है पर मजाल है कि कोई तीसरा आ जाए। खुद चाहे कुछ भी बोल दो मगर अगर तीसरा कोई कुछ बोल दे तो उसकी खेर नही। यही है चुलबुला प्यार भरा रिश्ता। हम तीन भाई बहन है, मगर बचपन में संयुक्त परिवार में रहे तो सब कजिन की धमा चौकड़ी ही अलग होती थी। वो पार्क में जा कर सारे झूलो पर कब्ज़ा करना, पेड़ पर चढ़ना, किराए पर लेकर साईकल चलना, रविवार के दिन साथ में बैठ कर चंद्रकांता औऱ जंगल बुक देखना। इंतज़ार करना कि इस रविवार को कौनसी फ़िल्म आने वाली है, फिर उसके बाद घंटो उसके बारे में चर्चा चलती रहती। सुबह साथ मे ग्रुप बना कर स्कूल जाने का मज़ा ही अलग होता था हम सब भाई बहन घर में सभी सदस्यो से एक एक रुपया इकठ्ठा करते और शाम को उसी पैसे से किराए पर कॉमिक्स औऱ किताबे खरीद कर लाते। चाचा चौधरी, बिल्लु, पिंकी, नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, डोगा, रमन, बालहंस, नंदन, चंदामामा औऱ न जाने कौन कौनसी। सब मे झगड़ा भी होता कि पहले मुझे ये पढ़नी है पर भैया झगड़ा सुलझा कर सबको एक एक कॉमिक्स पकड़ा देते। बचे हुए पैसों से अगले दिन भुजिया पार्टी होती थी। स्कूल से आते ही बैग फेंक कर सीधे इस फ़िराक़ में रहते थे कि आज हम कौन सा खेल खेलेंगे, छुपा छुपी, लोह लकड़, पकड़ा पकड़ी, खो खो, जंजीर या क्रिकेट। छोटे छोटे भाई बहनों को हम कच्चा निम्बू बना देते थे।

जैसे ही गर्मियों का मौसम शुरू होता। छत पर पूरी चिल्लर पार्टी का मज़मा लगता औऱ हम सब का एक ही शगल था वो था पतंगबाजी। भैया को छोड़ कर पतंग किसी को उड़ाना नही आता था, हम सब को पतंग लूटने में ही बड़ा मजा आता था, किसी की भी पतंग कटती, हम सब एक ही राग में बोई काटया कह कर चिल्लाते। पूरी शाम पतंगबाजी में ही निकल जाती। हम सब की मम्मी आवाज़ देते थक जाती पर हम अपनी दुनिया मे खोये रहते, हां जब तक धुनाई की धमकी न मिलती हम नीचे उतरने का नाम नही लेते। 

त्योहारों का मज़ा जो उस समय होता था आज नही आता।आज भी मैं उन दिनों को बहुत याद करती हूँ, कभी नम आंखों से कभी मुस्कुराते हुए कभी किस्से कहानियों में। होली होती थी तो हम सुबह पांच बजे उठ जाते गुब्बारे फुलाने के लिए, जब तक गहरी धूप नही हो जाती हमारी 'बुरा न मानो होली है' वाली होली चलती रहती। शाम का बड़ा इंतज़ार रहता, राम राम के बहाने सभी बड़ो से पैसे जो मिलते थे। रक्षाबंधन पर फरमाइशों के ढ़ेर लग जाते, ये चाहिए वो चाहिए। भुआ का इंतज़ार रहता क्योंकि सबसे पहले वो ही आकर हम सब को राखी बांधती, फिर हम बहनों का नंबर आता। वही दीवाली पर तो एक महीने पहले से आतिशबाजी शुरू हो जाती जो गुल्लक में पैसे जमा होते दीवाली तक सब खत्म हो जाते, आज भी याद है जब राकेट को उल्टा चलाने के चक्कर में जब छत में धूप में दिए बिस्तरों पर हमने आग लगा दी, तो बस घरवालो ने जो धुनाई की,बाप रे। पर हम तो बस हम थे नए नए तरीके निकाल ही लेते शरारतों के। रात को सभी बच्चे दादी माँ के पास इकठ्ठा होते कहानी सुनने के लिए औऱ तब तक सुनते रहते जब तक आखों में नींद न आ जाये। आश्चर्य होता है कि बिना किसी स्टोरी बुक के दादी माँ के पास इतना बड़ा कहानियों का खजाना कहाँ से आया।

आज सब बड़े हो गए सब अपनी ज़िंदगी मे व्यस्त हो गए है, शादी हो गयी है। फिर भी जब किसी पारिवारिक समारोह में सब मिलते है, तो हमारी गोष्ठी चलती ही रहती है, पुराने किस्से कहानियों की बौछार सी आ जाती है। जब भी मायके से ससुराल आती हूँ, एक अजीब सा अहसा��� होता है कि क्यों हम इतने जल्दी बड़े हो जाते है। आज जब अपनी बेटी को अपने कजिन के साथ खेलते देखती हूं तो कई बार यूहीं आंख भर आती है, कोशिश करती हूँ कि उसके बचपन मे फिर से अपना बचपन जी लूं।

डॉ शिल्पा जैन सुराणा

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