कहीं बहुत देर ना हो जाए......
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|   Aug 09, 2017
कहीं बहुत देर ना हो जाए......

विभा जब मात्र 18 बरस की थी तभी उसकी शादी हो गई थी।माँ की मृत्यु होने पर,पिता ने दूसरी शादी कर ली थी,विमाता को विभा को पढ़ाने के बजाय उसकी शादी करना ज्यादा आसान लगा होगा।23बरस की होते ना होते 2 बच्चों की माँ भी बन गई थी विभा।सास का व्यवहार विभा के साथ बहुत बुरा था।हमेशा विभा को खरी खोटी सुनाते रहना उनका मुख्य कार्य था।ससुर नम्र स्वभाव के थे उन्हें विभा पर दया आती थी।पर कलह के डर से वे प्रायः चुप ही रहते थे।बचा विभा का पति रमेश उसे तो विभा की कोई परवाह ही नहीं थी।सुबह माँ के साथ चाय पीते हुए उसकी दिनचर्या शुरू होती थी,फिर दिन भर व्यापार में व्यस्त और रात में कमरे में आते ही निढाल होकर सो जाना।विभा से तो कई कई दिन बात भी नहीं करता था।और कभी विभा मौका देखकर कुछ बताना चाहती तो श्रीमान बाहर माँ के पास जाकर बैठ जाते।विभा मन मसोस कर रह जाती।

                  विभा ने इसे अपनी नियति ही मान लिया,और अपने बच्चों की परवरिश में अपना मन लगा लिया।घर के काम और बच्चों से फुर्सत पाती तो कुछ खाली समय रहता विभा के पास।ससुर जी भले थे तो उन्होंने विभा को प्रोत्साहित किया और सास को भी मना लिया,और विभा को ब्यूटी पार्लर का कोर्स करवा दिया।दिन इसी तरह बीतते गए।एक दिन अचानक विभा की सासू जी को हार्ट अटैक आया काफी इलाज हुआ अस्पताल और फिर घर आने पर विभा ने सासू जी की बहुत सेवा की,लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया ना सका।मृत्यु के समय विभा की सासू जी की आंखों में विभा के लिए कृतज्ञता के भाव थे,लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी थी।अब घर में ससुर थे बुजुर्ग ,और बच्चे पढ़ने लगे थे।हाँ सासू जी की मृत्यु के बाद विभा के पति रमेश के रवैये में कुछ बदलाव जरूर आ गया था,लेकिन अभी भी विभा के हिस्से में पति की उपेक्षा का प्रतिशत ही ज्यादा था।खैर अब ससुर जी ने घर के एक कमरे में विभा का ब्यूटी पार्लर खुलवा दिया।अब विभा घर और बच्चों की देखभाल के साथ ही अपना पार्लर भी बखूबी संभाल लेती थी।धीरे -धीरे विभा को लगने लगा कि अब गाड़ी पटरी पर आ गई।विभा ने भी पति से कोई अपेक्षा रखना ही बंद कर दिया था।वह अपने घर ,बच्चों और पार्लर में मगन हो गई।लेकिन कुछ ही समय बीता होगा विभा के ससुर का भी स्वर्गवास हो गया। विभा को झटका तो लगा लेकिन वो जल्द ही सम्भल गई।

                  विभा के पति रमेश का रवैया अब बहुत बेहतर हो चुका था।शायद विभा का शांत स्वभाव और खुद की बढ़ती उम्र और माँ- पिता का साथ छूटने के असर था यह।अब वो विभा को थोड़ा अहमियत देने लगा था।विभा भी खुश थी कि चलो देर आये दुरुस्त आए पति के मन को अब मैं भाने लगी।लेकिन कहाँ ....विधाता ने तो शायद विभा के हस्से में परेशानियां ही लिखी थी।सब ठीक चल रहा था कि एक दिन घर लौटते समय रमेश सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया।विभा पर तो मानो वज्रपात हो गया ।लेकिन विभा ने हिम्मत नहीं हारी ।पति के जीवन के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया और प्राणपण से पति की सेवा में जुट गई।घर ,बच्चे और पार्लर के साथ अस्पताल आना जाना करती रहती।विभा के अच्छे स्वभाव के चलते पड़ोसियों ने विभा की बहुत मदद की।विभा की सेवा से रमेश ठीक तो हो गया लेकिन एक अपाहिज के रूप में घर लौटा।इलाज और अस्पताल के खर्चों के चलते रमेश का व्यापार ठप्प हो गया ,सब बेच कर अस्पताल का बिल चुकाने के बाद भी काफी बड़ी रकम बची थी ,सो विभा ने फिक्स डिपॉजिट कर दिया। 

                रमेश घर में रहने लगा। वो बस बैठा- बैठा चुपचाप विभा को देखता रहता,और उसकी आंखें डबडबा जाती, तभी विभा अचानक सामने आकर उसके सिर पर हाथ फेर कर चली जाती।अकेले में रमेश फफक- फफक कर रो पड़ता।वक्त तो अपनी रफ्तार से खिसकता गया।विभा की तपस्या का रंग बच्चों की सफलता के रूप में निखरा।माँ का संघर्ष बच्चे पग- पग पर देखते आए थे ।विभा की बिटिया साइन्टिस्ट और बेटा सॉफ्टवेयर इंजिनियर बन चुका है अब। 

                    रमेश अभी भी व्हील चेयर पर है।बैठे हुए ही कुछ काम करके विभा का हाथ बंटाने की कोशिश करते हैं।विभा तन्मयता से रमेश की हमेशा की तरह सेवा करती है।साथ ही अब विभा सफल ब्यूटीशियन बन चुकी है।

                    सुबह का वक्त था,दोनों बच्चे अपने ऑफिस चले गए,घर में विभा और रमेश थे।रमेश व्हील चेयर पे बैठा था,तभी विभा प्लेट में खाना लेकर रमेश को खिलाने आई।रमेश ने विभा से प्लेट लेकर टेबल पर रख दी,और विभा को हाथ थाम कर पास बिठा लिया।और रमेश ने विभा से कहा-तुम्हें मुझसे बहुत शिकायतें होंगी ना।विभा ने ना में सिर हिलाया।रमेश ने विभा के झुके हुए सिर पर अपना सिर टिका दिया।दोनों की आंखों से अविरल आँसू बह रहे थे।रमेश की आंखों से पछतावे के और विभा की आंखों से सुकून के..........।

                 💐   हर पति को चाहिए कि वो अपनी पत्नी को उसके हिस्से का प्यार और सम्मान दे।माँ पिता को अहमियत अवश्य दें लेकिन पत्नी की उपेक्षा करके नहीं।क्योंकि हर व्यक्ति के जीवन में वह पड़ाव आता है जब उसके माता, पिता,भाई,बन्धु और बच्चों का साथ छूट जाता है।उस दौर में पत्नी ही आपका निःस्वार्थ भाव से साथ निभाती है।तो जिस दिन वह अपना सर्वस्व त्याग कर पति और उसके घर को अपनाती है, उसी दिन से उसे भरपूर प्यार और सम्मान दें जिसकी वो अधिकारिणी होती है।💐

                💐हो सकता है हर पति रमेश जैसा ना हो लेकिन अगर कुछ हद तक भी कोई विभा किसी घर मे उपेक्षित है तो रमेश की तरह पछताने से बेहतर है सम्भल जाएं।कहीं  देर ना हो जाए...............

     अपने विचार अवश्य साझा करें ,मुझे इन्तज़ार रहेगा😊 

                   

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