और मुझे प्यार मिल गया ...2
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|   May 31, 2017
और मुझे प्यार मिल गया ...2

जैसा की आप पिछले भाग में पढ़ चुके है | (https://www.mycity4kids.com/parenting/skds/article/typewriter-part-1)

अमर और लता की सगाई हो गयी थी | लेकिन लता कन्फ्यूज्ड थी | कैसे मान गया अमर | 

बुआ और माँ कुछ बात कर रहे थे | बुआ की सकल से अजीब से चिढ आने लगी थी मुझे | क्या जल्दी थी इन्हें मुझे एक अनिश्चिंत से रिश्ते में बांधने की | खैर छोड़ो |शादी होने तक भी कई बार मन में आया की जाऊंँ और माँ बाउजी को बता दूँ सब , पर नहीं बोल पायी |  

उन सवालो और शंकाओं के साथ शादी का दिन आ गया | सब खुश थे सिवाए मेरे | फिर भी कुछ अच्छा होने की आस लेकर में विदा हुई|

अमर के घर में उनकी माँ थी और एक छोटी बहिन | सास में मुझे माँ जैसा स्नेह मिला | और नन्द में छोटी बहिन जैसा | पर अमर और मेरे बीच अभी भी गहरी खाइयां थी | न उस वाकिये के बारे में  मैंने उनसे कभी पूछा न उन्होंने ही जिक्र करना चाहा| एक अटूट बंधन में बंधे हुऐ भी हम दोनों , अनजान थे , अजनबी थे | बस जैसे जैसे दिन बीते मुझे यहीं समझ आया के ,अमर इंसान बुरे नहीं हैं | 

एक दिन माँ जी ने पास आकर कहा ," बोर हो जाती होगी तुम भी | मैंने भी बोला ," हाँ , माँ ज्यादा कुछ करने को होता नहीं है | शायद उस दिन उन्होंने मेरी आँखों की उदासी में डूबे सवालों को पढ़ लिया था |

 " अमर के साथ पढ़ती थी वो लड़की | पसंद थी उसे | मुझे भी तभी पता चला बेटा जिस दिन तुम्हेंं पता चला , वरना तुम्हें ये तकलीफ कभी न होने देती |मैं मान भी गयी थी | क्युकी मेरे पास अमर के सिवा था ही क्या |" माँ रोने लगी मैंने उनका हाथ पकड़ा और बड़ी हिम्मत करके पूछा | फिर हुआ क्या माँ |

" अमर जब उससे शादी की बात करने गया , तो उसने साफ कह दिया की वो उसकी माँ और बहिन के साथ नहीं रहेगी | उसके पिताजी उन्हें विदेश भेजने का बंदोबस्त कर रहे थे | अमर के बहुत समझाने पर भी वो नहीं समझी की अपनी विधवा माँ और छोटी बहिन को वो नहीं छोड़ सकता |कुछ ३-४ दिन में उसने किसी NRI लड़के से सगाई भी कर ली | अमर को समझ नहीं आया बेटा ये धोखा था , रुस्वाई या कुछ और | और उसके सवाल , सवाल ही बन कर रह गए | हो सके तो मुझे माफ़ कर देना बेटा," |माँ जी रोने लगी | मैंने उन्हें गले से लगा लिया | 

इसमें आपका क्या दोष माँ, ये तो मेरी नियति है |मैंने मन ही मन सोचा।

" कपडे अलमारी में रखे है , और सामान टेबल पर |," मैंने अमर से कहा | वो ऑफिस के काम से १ हफ्ते के लिए शहर जा रहे थे | मुझे कोई उदासी महसूस नहीं हो रही थी | उल्टा सुकुन था की , कुछ दिन उस असहजता से छुटकारा मिलेगा | 

" माँ का ख्याल रखना ,ठीक है | आँगन में मैं सर निचे करके खड़ी थी तो बड़ी खुशी हुऐ की अमर मुझसे बोल रहे हैं | मैंने जैसे ही ठीक है बोलने के लिए होठ खोले तो देखा वो मेरी नन्द को बोल रहे थे | मुझे अपनी बीवी न सही पर इस घर की बहु तो समझे | मैं सोचती ही रही और वो चले गए | 

अमर को वहीं नौकरी का ऑफर मिला था | माँ ने आग्रह किया की मैं पहले जाऊंं फिर वो और छोटी आएगी | मुझे लगा मैं रह कैसे पाउगी अमर के साथ बिना माँ जी के | लग रहा था रोक ले कोई पर नहीं हुआ | जाकर एक मकान को हमने बड़ी मेहनत से घर बनाया | धीरे -धीरे बीते दिनों के साथ मैं और अमर अब काफी सहज हुऐ | अब हमे बात करने का मौका मिला , पर अभी भी मुझे उनकी आँखों मैं खुद के लिए प्यार नज़र नहीं आता था | पता नई मैं ज्यादा सोचती हुँँ या सच है , खैर छोड़ो जो भी था पहले से बेहतर था |

" तुम्हे कल कॉलेज जाना है | कुछ फॉर्मलिटीज हैं एडमिशन की वो पूरी कर लेना | मैं बिजी हूँ वरना चलता | अच्छा है आगे पढ़ोगी तो बोर भी नहीं होना पड़ेगा घर पर |" , अमर ने कहा मैं अपना काम कर कॉलेज पहुंची और सब पूरा कर वापिस आ रही थी के रस्ते मैं ऑटो खराब हो गयी | ऑटो वाला दूसरी ऑटो का कह कर वापिस ही न आया | कई देर इंतज़ार करके भी कोई बस या ऑटो मुझे नज़र न आयी तो मैं घबरा गयी और मुझे रोना आ गया | मैंने टेलीफोन बूथ से अमर को फ़ोन किया ," अमर मैं खो गयी हूँ , वो भी पता नी कहाँ | और मेरी रुलाई छूठ गयी | अमर ने एक दम भागते हुऐ कहां, कहां हो लता , किसी से पूछो , मैं अभी आता हूँ | रोना नहीं | मैंने किसी से पूछ कर फिर उन्हें फ़ोन किया तो पता चला जगह उनकी ऑफिस से ज्यादा दूर नहीं थी | 

अमर को दूर से आता देख कर मुझे फिर रोना आ गया | वो भाग कर मेरी और आए और कस कर मुझे गले से लगा लिया ," ऐसा कोई रोता है पगली , जान निकाल दी थी | " मैंने बड़े आश्चर्य से उन्हें देख ही रही थी की उन्होंने मेरे आंसू पोछते हुऐ मुझे फिर आलिंगन में भर लिया | उस दिन हुऐ प्यार की बारिस ने मुरझाई हुऐ अमर लता की बेल को हरा कर दिया था |

मैंने खुद को खो कर अपना प्यार पा लिया था |

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