परिनिता : अंतिम भाग
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|   Jun 02, 2017
परिनिता : अंतिम भाग

रात का अँधेरा अब आबो हवा को घेर चूका था। निशा ने हिरिनी की रिपोर्ट्स पड़ी तो उसमें उसके प्रेग्नेंट होने की खबर पक्की हो गयी। सीटी स्कैन और इंटरनल चेकअपस की रिपोर्ट्स आना अभी बाकी था वो सब सुबह तक आएँगी। निशा एक बार फिर से हिरिनी के पास जाती है उसे इस हाल में देख उसकी आंखें भर आती गई। पर वह खुद को संभालती है, नर्स को हिदायतें देती है और अगर कोई भी आपातकालीन बात हो तो उसे सूचित किया जाये कह कर वो बाहर आती है। 

“चलिये आंटी अंकल आप लोग भी थोड़ा आराम कर लीजिए। आप लोग भी थक गए होंगे। मेरा घर यहीं है पास में आप वहां चलिये।” निशा ने बोला। हिरिनी के माता पिता दोनों ने पहले एक दुसरे को और फिर निशा को देखा। “नहीं बेटा हम यहीं रहेंगे हिरिनी के पास। उसे हमारी जरूरत पड़ी तो। हमारा मन नहीं मानेगा। तुम जाओ बेटा ,तब से तुम भी लगी पड़ी हो। थक गयी होंगी और कल तुमको तो रोज़ की तरह अस्पताल भी आना है। तुम को अपना डॉक्टर होने का फ़र्ज़ निभाना है। तुम यहाँ मिल गयी हमे इसी में तसल्ली है।” “ नहीं आंटी आप लोग चलिये मेरे साथ और क्या मैं आपकी कुछ नहीं। मैं हूँ न कुछ नहीं होगा हिरिनी को अब उसकी दोस्त है उसके साथ। और आपकी या मेरी जरूरत उसे अभी नहीं बाद में ज्यादा पड़ेगी। जब वो होश में आएगी जब उसे अपनी लड़ाई लड़नी होगी, जब उसे अपना बच्चा पालना होगा, तब होगी उसे हम सब की जरुरत और उसके लिए हम सब का भी मजबूत होना जरूरी है। आंटी अभी यहाँ रहने की जरूरत नहीं है, उसको होश नहीं आएगा क्यूंकि उसके जख्म गहरे हैं तो हमे अभी उसे बेहोश ही रखना होगा। आप लोग आराम कर लीजिये अगर कोई जरुरत हुई भी तो हम आ जायेंगे मैंने नर्स को बता दिया है सब।चलिये।” निशा ने हिरिनी की माँ की तरह हाथ बढ़ाया और वो सब अस्पताल से बाहर आ गए। 

निशा ने ड्राइवर को फ़ोन कर गाड़ी लाने को कहा। बस 15 मिनट में सब निशा के घर के बाहर थे। उसका घर हॉस्पिटल के काम्प्लेक्स में ही था। “कामिनी” निशा ने अपनी बाई को आवाज़ लगाई उसने आकर दरवाज़ा खोला। निशा ने दोनों को बैठने को कहा और कामिनी को खाना लगाने का इशारा किया। सब शांत थे। एक सन्नाटा सा पसरा हो जैसे। खाना खा निशा ने उनको उनका कमरा दिखाया और आराम करने को कहा। कमरे से बाहर आने से पहले निशा ने हिरिनी की माँ के हाथ पर हाथ रख उनको तसल्ली दी। 

निशा बाहर बालकनी में आ गई। मुड़े पर बैठ वो एक टक न जाने क्या निहार रही थी की तभी कामिनी ने उसे चौकाया। “दीदी कॉफ़ी। दीदी मैं जाऊं या रुकूँ। कुछ और काम है तो बता दीजिए।” कामिनी ने निशा को कॉफ़ी का मग देते हुए पूछा। “नहीं तू जा हाँ पर सुबह रोज़ से जल्दी आना है, और नाश्ता भी टाइम से चाहिए। लेट मत करियो।” “ठीक है दीदी” इतना कह कामिनी दरवाज़ा बंध कर चली गयी। निशा वही बालकोनी में बैठी रही, उसे शरीर में एक जकड़न सी महसूस हो रहा थी ताकत न हो जैसे शरीर में। और तभी यादों के बादल ने उसके दिमाग को भी जकड़ लिया।

निशा और हिरिनी दोनों हिमाचल के एक गांव में रहने वाली बचपन की दोस्त थीं। दोनों की दोस्ती इतनी पक्की की दो जिस्म पर एक जान। गांव के लोग अक्सर उनको यही कह कर चिढ़ाते की तुम दोनों की शादी तो एक ही शहर, एक ही गांव और भला हो अगर एक ही घर के लड़के मिल जाएं। तुम दोनों का तो एक दूसरे के बिना खाना भी हजम न होता। हिरिनी अपने नाम के अनुरूप हिरन सी चंचल और निशा उसके बिलकुल उल्टी शांत। रूप और गुण में मगर दोनों एक जैसी। दोनों की दोस्ती निभते निभते अब जवानी की दहलीज पर आ गयी थी।

इसे किस्मत का ही संजोग कहिये की दोनों की शादी एक ही गांव में हुई और इतेफाक से दोनों के पति दोस्त भी थे। निशा का पति रितेश एक आर्मी ऑफिसर था। हिरिनी का पति संजय एक कंप्यूटर इंजीनियर था। दोनों ही जोड़ियां एक दूसरे की पूरक लगती थी। शादी के कुछ टाइम बाद ही हिरिनी संजय के साथ शहर चली गयी। और निशा गांव में ही रह गयी क्यूंकि रितेश की पोस्टिंग सियाचिन में थी। गांव की औरतें कभी कभी निशा को चिढ़ाती की रितेश इतना पढ़ा लिखा है वो तो शहर में कोई और ढूंढ लेगा। निशा कभी कभी उदास हो जाती लेकिन मीलों दूर बैठी हिरिनी अपनी बातों से उसमे नयी जान फूंक देती। वो ख़ुश थी। उसकी खुशी उसकी आवाज़ में झलकती थी। लेकिन निशा को अपनी जिंदगी की खुशियों का इंतज़ार था।

करीब छः महीने बीते रितेश घर आया। इस बार रितेश ने निशा के साथ टाइम बिताया। रितेश के वापस जाने के एक दिन पहले रितेश ने निशा के हाथ में एक फोम् दिया। निशा ने हैरानी से देखा। रितेश ने फॉर्म पढ़ने को कहा तो जैसे निशा अपनी सुधबुध खो बैठी। उसके मुंह से बस इतना निकला “आपको कैसे पता चला?” रितेश ने उसे बताया कि हिरिनी ने एक दिन उसको फ़ोन कर सब कुछ बताया ,गांव की औरतों की बातें और उसके सपने के बारे में। “तुम डॉक्टर बनना चाहती हो न।निशा मेरी नौकरी ऐसी है जिसमे जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है। मेरी जिंदगी पर पहले मेरे देश का हक़ है। और मैं नहीं चाहता की अगर मुझे कहीं कुछ हो जाये तो तुमको किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े। और अगर सब ठीक भी रहता है तो भी मैं चाहता हूँ की मेरी बीवी अपने पैरों पे खड़ी हो,उसे किसी के सहारे की जरूरत न पड़े। अपनी पत्नी के सपनो को पूरा करना मेरा धर्म है। और हाँ इसमें माँ पापा की भी रज़ामंदी है। उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, तो अपनी इस उलझन से भी बाहर आ जाओ।” निशा ख़ुशी से रितेश से लिपट गयी ।उसकी आँखों से झरझर आँसूं बहने लगे। आज वो खुद को खुशकिस्मत समझने लगी। उसके मन से दुआ निकली की भगवान ऐसा पति सबको दे। 

उसके बाद लगभग पांच साल निशा ने अपनी पूरी मेहनत झोंक दी। बीच बीच में उसकी कभी कभी हिरिनी से बात होती और कभी रितेश को संजय से उनके हाल चाल मिल जाते । और एक दिन रितेश ने बताया कि संजय की नौकरी चंडीगढ़ में लग गयी है। वो वहां चले गए हैं। निशा ने डॉक्टर बनने के बाद एक साल आर्मी में ट्रेनिंग ली और फिर पिछले दो सालों से को भटिंडा में आर्मी हॉस्पिटल में है। और रितेश की पोस्टिंग अम्बाला थी। 

7 साल हो गए थे निशा को हिरिनी से मिले। एक दिन जब ऑफ में निशा रितेश के पास अम्बाला आयी हुई थी तो उसने रितेश को संजय से बात कर उनके चंडीगढ़ का पता पूछने को कहा। वो हिरिनी को सरप्राइज देना चाहती थी। पर संजय का फ़ोन नहीं लगा। उसने हिरिनी को फ़ोन मिलाया पर उसका भी नंबर नहीं मिला। वो परेशान और उदास हो गयी। रितेश ने उसे यह कह कर समझाया कि शायद नंबर बदल गया हो। पर निशा को कुछ बेचैनी सी हुई। 

उसके बाद निशा अपनी जिंदगी में मशरूफ हो गयी । हॉस्पिटल और घर परिवार की जिम्मेदारियों में वो हिरिनी को भूल गयी थी पर मन में एक विश्वास था कि उसकी सहेली खुश होगी। हिरिनी एक ऐसी शख्शियत की मालकिन थी की कोई उसे प्यार करे बिना रह ही नहीं सकता था। और यही बात निशा में उसकी खुशियों का विश्वाश जगाती थी।पर आज वो विश्वास टूट गया। 

आज जब इतने सालों बाद हिरिनी उसे मिली तो इस हाल में । हिरिनी की ऐसी हालत ने निशा को अंदर तक दहला दिया। निशा ने कई बार पति की मार खाकर आयी औरत के जख्मो के लिए मरहम लिखा था। सैकड़ों अध्जली और शोषण की शिकार महिलाओं का इलाज़ किया था। कभी कभी तो उसके पास ऐसे केस आते की वो भी अंदर ही अंदर डर और सहम जाती। तब दिल में सोचती की भगवान मेरी गोद में बेटी मत देना। पर फिर जब अपनी और हिरिनी के बारे में सोचती, और शादी के बाद मिलने वाले ससुराल और पति के प्यार के बारे में सोचती तो उसमे फिर से एक नयी उम्मीद जग जाती। पर आज वही उम्मीद फिर से टूट कर चकना चूर हो गयी ।

सच ही है एक लड़की का जीवन दो परिवारों की समझ और व्यवहार पर निर्भर करता है-एक माता पिता और दूसरा पति। माता पिता अपनी बेटी को शायद इसी लिए कोसते हैं कि उनको उसके पैदा होने के साथ ही उसके पति और ससुराल कैसा होगा का डर सताने लग जाता है। अगर बेटी को प्यार करने वाला एक सुखी संपन्न परिवार मिल जाता है तो माता पिता अपना जीवन सफल मानते हैं और अगर नहीं तो अपने और उसके कर्मों को कोसते हैं। 

एक नारी के जीवन में एक सुयोग्य जीवन साथी क्या है, ये बात आज निशा अच्छे से समझ गयी थी। और अब उसने मन में ठान ली थी की वो अब हिरिनी को उस दरिंदे की चुंगल से छुड़ा कर रहेगी, जिसने एक हँसती खेलती मदमस्त हिरिनी की कस्तूरी उससे छीन उसको निर्जीव कर छोड़ दिया था। 

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