त्रियाचरित्र 
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|   Feb 10, 2017
त्रियाचरित्र 

"त्रियाचरित्रं पुरुषस्य भाग्यम दैवो न जानती कुतो मनुष्य:"मतलब पुरुष के भाग्य और औरत के त्रियाचरित्र को देवता भी नहीं समझ पाये तो मनुष्य क्या है।

इसी त्रियाचरित्र के सहारे तो भगवान विष्णु ने समुन्दर मंथन के बाद राक्षसों से ,मोहिनी बन, अमृत छीन पहले देवताओं को पिला दिया था। इसी त्रियाचरित से मेनका ने विश्वामित्र की तपस्या भंग की थी। 

इसी त्रियाचरित्र की वजह से तो कैकयी राजा जनक की चहेती थी और इसी त्रियाचरित्र को दिखा उसने राम के लिए बनवास और भरत के लिए राजपाठ माँगा था।

वैसे त्रियाचरित्र को सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही पहलुओं से देखा जा सकता है। सकारत्मकता जहाँ इसे औरत की चतुराई कहती है वहीं नकारात्मकता उसे चरित्रहीन कहती है। 

करीब 13 साल पहले की बात होगी, गृहशोभा पत्रिका से तो आप सभी परिचित हैं, मैंने उसमे एक लेख पड़ा था त्रियाचरित्र पर। उसमे लिखा था कि कभी कभी एक औरत के लिए त्रियाचरित बहुत जरूरी भी है। अपनी घर गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसे कभी कभी ऐसे कदम उठाने पड सकते हैं जिन्हें शायद समाज त्रियाचरित्र बोले। और करीब 100 तरीके दिए हुए थे त्रियाचरित्र के। तब तो शादी को दो साल ही हुए थी। मन उलझा रहता था अपने परिवार की खुशियों में। पति के प्यार में। दुनियादारी में। तब तो माँ की कही बातें ही याद आती थी की बेटा सास और पति को खुश रखना। तब कहाँ थी अक्ल इस त्रियाचरित्र या उसके पहलुओं को समझने की । मैंने बस पढ़ा, पर शायद कहीं न कहीं दिल कुछ तो चोट खा चूका था, इसीलिए यह शब्द जेहन में रह गया। 

साल बीतते गए अब तक तो खुद को भी गृहस्थ जीवन की कहानी समझ आने लगी थी। अपना सुख दुख अपनी सहेलियों संग कहती तो सबकी एक कहानी होती । पर एक सहेली जो हमेशा मुझे यही कहती आयी, हमेशा खुद को दूध का धुला दिखाओ। वो अक्सर मुझसे कहती है कभी कभी करनी पड़ती हैं चालाकियां। रोना, अदाएं , गुस्सा, खुद को लाचार दिखाना जरूरी है। पहले मुझे कभी समझ नहीं आया पर जैसे जैसे उम्र और तजुर्बा बड़ा उसकी बातों की गांठ खुलने लगी। 

मम्मी को अकसर कहते सुनती थी पैसे नहीं हैं, और फिर मेरी शादी के बाद उन्होंने बताया कि वो पापा से छिपा के कुछ रकम अलग रख देतीं थी और फिर कुछ कुछ करके मेरे लिए गहने बनवाती रहीं ताकि शादी के समय बोझ न आये। ऐसा ही कुछ सास ने भी बताया। मुझे इस प्रथा को अपनाये अभी लगभग कुछ ही साल हुए थे कि…….मेरा त्रियाचरित्र खुल गया। लगता है एक पुरुष औरतों से ज्यादा त्रियाचरित्र जानता है और वो भी बिना विवाहित हुए। 

जी हां मैं हमारे प्रधानमंत्री जी की बात कर रही हूँ जिन्होंने नोट बंदी की तो हर एक औरत चाहे वो बूढ़ी हो या जवान, शादीशुदा या कुँवारी, कामकाजी या घरेलू, सब का त्रियाचरित्र सबके समकक्ष कर दिया। जी हां, औरतों का अपने पतियों की चोरी छुपे पॉकेट मारना भी एक तरह का त्रियाचरित्र ही है। और वह त्रियाचरित्र कहीं आटे के डब्बे , तो कहीं दाल के डिब्बे , तो कहीं पुराने कपड़ों के बण्डल में छुपा बैठा था। परंतु नोटबंदी से उसे बाहर आना ही पड़ा। 

यह तो था त्रियाचरित्र का एक पहलु पर दूसरा भी है और वह है, चरित्रहीनता। जैसे मंथरा अगर न होती तो शायद रामायण की पृष्ठभूमि ही न बनती। ललिता पवार तो आपको याद ही होगी, हिंदी फिल्मों की खलनायिका। उनका त्रियाचरित्र ही तो होता था सहायक हर कहानी को गढ़ने में। घर को तोड़ना, इधर की उधर करना। फूट डालो राज़ करो। यदि हम खुश नहीं तो कोई और कैसे खुश रहे। त्रियाचरित्र को बेवफाई से भी जोड़ा जाता रहा है। एक औरत जब किसी और पुरुष के लिए अपने पति या प्रेमी को छोड़ दे तो उसे त्रियाचरित्र कहा जाता है। पैसे या सफलता के लिए चरित्रहीन हो उसे त्रियाचरित्र कहा जाता है। 

त्रियाचरित्र’ एक ऐसा शब्द है जो औरतों को एक तरफ एक सफल नारी के रूप में दिखाता है वही ये किसी औरत के लिए नकारात्मक रूप में बोले जाने पर उसकी छवि को ख़राब भी करता है। त्रियाचरित्र उस ईश्वर द्वारा औरत को दिया गया एक वरदान है,पर त्रियाचरित्र में की गयी एक गलती श्राप भी बन सकती है। 

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