नए जीवन की दुखद शुरुआत।।।
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|   Aug 13, 2017
नए जीवन की दुखद शुरुआत।।।

हम सभी अपनी शादी के लिये कितने उत्साहित होते है क्योंकि शादी के बाद जीवन की नई शुरुआत होती है। मेरे लिये तो मेरे शादी का दिन ही सबसे दुखद  बन गया।जिस दिन मेरे आत्मविश्वास को चोट पहुँचाई गई ,जिस दिन मुझे अहसास हुआ की में एक अबला नारी हूँ व मेरा कोई अस्तित्व नहीं है।

मै घर की सबसे बड़ी बेटी थी,माता पिता ने कभी ये अहसास ही नहीं होने दिया की मै एक लड़की हूँ, मतलब उन्होंने हम भाई बहनो में कभी किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया ,चाहे वो पढ़ाई हो या फिर खाना पीना ।क्योंकि मै सबसे बड़ी थी व हर चीज़ में तेज़ थी चाहे वो पढ़ाई हो घर या बाहर के काम।मेरे माता पिता को मुझ पर गर्व था।मेरे छोटे भाई बहन भी मेरा पूरा सम्मान करते थे।इसलिये मुझ में कूट कूट कर आत्मविश्वास भरा हुआ था। 

मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और नौकरी  करने लगी।फिर पिता जी मेरी शादी के लिये लड़का ढूंढने लगे।कई सालो तक भी अच्छा लड़का ना मिल पाने के कारन मेरे माता पिता बहुत परेशान रहने लगे।कई रिश्ते टूटे,कुछ दहेज़ की वजह से,कुछ मेरी नौकरी करने की वजह से क्योंकि कोई नौकरी वाली बहु नहीं चाहता था सबको घर का काम करने वाली बहु चाहिये थी।

मेरी नौकरी को शादी में बाधा देखकर पिता जी ने मेरी नौकरी छुड़वा दी।कुछ दिनों बाद मेरा रिश्ता पक्का हो गया ।मेरे पापा ने लड़को वालो से कई बार पूछा की आप की कोई मांग हो तो हम से पहले ही कह दो क्योकि मेरी ज्यादा देनी की हैसियत नहीं है।पर वो हमेशा यही कहते की हमारी कोई मांग नहीं है,जो आपकी इच्छा हो आप वो दे देना।उनका ये सिद्धांत था की अपने मुह से माँगो मत कुछ पर हमे चाहिये भी सब कुछ।समाज में हम अच्छे बन जाये की कितने अच्छे लोग है बिलकुल नहीं मांग रहे ,पर लड़की वाला खुद ही सब कुछ हमें दे ।

शादी का दिन भी नज़दीक आता जा रहा था। मेरे पिता ने अपनी हैसियत से ज्यादा ही खर्च किया शादी में ,पर जैसे जैसे शादी की रस्मे होती गई,मेरे ससुराल वालो का व्यवहार बदलता गया।उन्हे हमारी कोई चीज़,कोई काम पसंद ही नहीं आया।यहाँ तक की मेरे पति भी रोज़ मुझसे फ़ोन पर मीनमेख निकलते।मैंने कई बार कहा की ये रिश्ता सही नहीं है ।पर मेरे घरवाले ये रिश्ता हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे।शादी में उनके मनमुताबिक न होने के कारन ,जब मेरा प्रथम गृहप्रवेश हो रहा था तो मेरे ससुराल वालो ने और बाकि रिस्तेदारो ने ना जाने  कैसे कैसे ताने दिए ,मुझे खूब गालिया दी गई ,मनहूस बोल कर कोसा गया,माता पिता को गालिया दी गई,यहाँ तक की मेरे पति भी उनमे ही शामिल हो गये ।दुल्हन के जोड़े में सब के ताने सुनने और रोने  के अलावा मै कुछ नहीं कर सकती थी।रोते रोते बस यही सोच रही थी इन सब में मेरा व मेरे माता पिता का क्या दोष है।

उस दिन मुझे अहसास हुआ क्यों लोग लड़की पैदा होने पर दुखी होते है।क्यों लड़कियों को मार दिया जाता है।क्यों समाज में लड़कियो को लड़को से कम समझा जाता है ।उस दिन मेरे आत्मविश्वास इतना नीचे गिर गया, की शायद  अब पहले  जैसा आत्मविश्वास मुझमें कभी  नहीं आ पायेगा ।मेरे नए जीवन का प्रथम दिन ही नहीं बल्कि पूरा जीवन ही दुखद बन गया।

शिक्षा के विस्तार और कानून बन जाने के बावजूद दहेज़ प्रथा खूब फलफूल रही है।जिस के वजह से न जाने कितनी लड़कियो को रोज़ जलाया जाता है,मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है,आत्मविश्वास को ठेश पहुचाया जाता है।दहेज़ तो हर शादी में लिया दिया जाता है,यदि लड़के वालो को दहेज़ चाहिये ही होता है तो खु��� कर आपने मुह से माँगना चाहिये।जिससे किसी लड़की नीचा न देखना पड़े।

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