अंध विश्वास पर विश्वास
25958
2
3
|   Jul 04, 2017
अंध विश्वास पर विश्वास

दिया ने बहुत सहमा हुआ सा कदम रखा था अपने ससुराल में। बहुत मुश्किल से देव के परिवार वाले इस रिश्ते के लिए राजी हुए थे। पर कोई सोच भी नहीं सकता था ऐसा कुछ होगा उसके घर में कदम रखते ही। भगवान भी शायद कुछ खेल खेल रहे थे उसके साथ। धरती काप गई थी उसके कदम रखते ही, भूकंप जो आ गया था। कुछ लोग दबी जुबान से इसको अपशगुन कह रहे थे।

परंतु पढ़े लिखे देव और दिया को इन बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो तो अपनी नई दुनिया के ख्वाब सजाने में लगे हुए थे। नए घोंसले की चाह सबको होती है जो आने वाले समय में उनको पानी और तूफान से बचा सके। परंतु तूफान तो उनके जीवन में प्रवेश कर चुका था। सास जो थोड़ा पुराने खयाल की थीं उनके मन में वहम बैठ गया था। दिया को सच्चे मन से अपना नहीं पा रहीं थीं।

दिया पढ़ी लिखी थी वह नौकरी करना चाहतीं थी, परंतु परिवार से उसे इजाज़त नहीं मिल रही थी। पितृ सत्तात्मक परिवार में हमेशा नारी को इजाज़त लेकर सारे काम करने पड़ते हैं, ऐसा क्यूं होता है? परंतु परिवार की आर्थिक हालात को देखते हुए देव और दिया ने निर्णय लिया कि उसको अपने पैर पर खड़े हो जाना चाहिए। अपनी डिग्री को निरर्थक ना जाने दे, उसका महत्व समझे।

परंतु यह बात उसके परिवार को समझ नहीं आई। दिया घर का काफी कार्य करके ऑफिस जाती थी, अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझती थी, पर शायद उसको कोई नहीं समझता था। दिया ने प्रयास जारी रखा, उसको आशा थी कि छोटे छोटे प्रयास से परिवर्तन अयश्य आयेगा। जिस प्रकार रात का अंधकार दूर कर सूरज अपनी संपूर्ण आभा के साथ निकल आता है, उसी प्रकार आशा की किरण उसके मन को खुश कर जाती थी।

परिवार में आर्थिक जरूरत होती तो सब देव से मदद लेते परंतु दिया से कोई कुछ नहीं कहता। दिया भी सारा पैसा सुरक्षित रखती जाती थी कहीं व्यर्थ खर्च नहीं करती थी। एक रात देव के पिता कि तबियत खराब हो गई, हार्ट सर्जरी की नौबत आ गई। पूरा परिवार चिंता में पड़ गया, पिता की चिंता और आर्थिक तंगी ने सबको तोड़ दिया था। ऐसे में दिया ने राह सुझाई, और अपनी सास से प्रार्थना की कि यह पैसा इसी दिन के लिए था।

भूकंप वाली घटना के डर से जिस सास ने कभी दिया को अपनाया नहीं था, उनकी आंखों में आज पानी था। उनको समझ आ गया था कि अंधविश्वास पर विश्वास कर के उन्होंने गलती की। उनको अपने बच्चों पर विश्वास करना चाहिए था। अब उनको अपनी बहू दिया पर गर्व था।

आखिर क्यूं हम सब इतने पुराने और बिना लॉजिक वाली बातों पर विश्वास करते हैं। दूध गिर जाए तो अपशगुन, बिल्ली रास्ता काट जाएं तो काम पूरा ना होने का डर, शनिवार को लोहा नहीं खरीदते, बृहस्पतिवार को बाल नहीं धोते, पीरियड्स के समय मंदिर नहीं जाते, परीक्षा के समय दही और मीठा खाना शुभ है आदि आदि। यह सब धारणाएं अब पुरानी हो चुकीं हैं इनको समय के साथ बदलने की आवश्यकता है। इनमें से कुछ को तो मैं भी मानने से अपने आप को नहीं रोक पाती, पर कुछ के लिए सफलता अवश्य मिली है। क्या आप भी किसी अंधिश्वास से ग्रसित है?

Feel free to share your thoughts in the comment section 

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day