मस्ती की पाठशाला
2782
3
2
|   Jan 04, 2017
मस्ती की पाठशाला

यह आजकल की विडम्बना ही है, की परिवार हिंदी भाषी होते हुए भी, हमारे बच्चे हिंदी लिखने-पढ़ने से कतराते हैं। हर विषय अंग्रेज़ी में पढ़ाया जाता है। विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल आदि सभी। केवल एक हिंदी ही हिंदी में रह जाती है। बाल साहित्य भी मुख्यतः अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध है। उनकी कापी में किसी दिन झाँक लूँ तो हैरान रह जाती हूँ। समझ नहीं आता की एक ही वाक्य में वे इतनी सारी ग़लतियाँ कैसे कर लेते हैं? विध्यालय की हिंदी का स्तर आज भी वही है, पर बच्चों की क्षमता घटती जा रही है।

इस बार हमारी तेरह वर्ष की बिटिया नंदिनी को अध्यापिका ने 'आँख' पर मुहावरे लिख लाने को कहा। नंदिनी ख़ासी क्षुब्ध थी बोली, "ऐसी पढ़ाई क्यों पढ़ते हैं जो आजकल use ही नहीं होती?" मैंने समझाया ऐसा नहीं की ये महावरे उपयोग नहीं होते। बस हमें ध्यान देने की ज़रूरत है। नंदिनी बोली, "मेरे पास time नहीं है इतना।"

अब बात ऐसी है की ईश्वर ने हमें जन्म से ही कुछ नटखट प्रकृति दी है। कोई समस्या का हल निकलना हो तो बुद्धि उल्टी चल पड़ती है। झटपट सोचा की ऐसा क्या करें की लोग आँख के महावरे बोलें? बचपन मैं एक चित्रकथा पढ़ी थी। बंगाल के एक राजा के दरबार में एक विदूषक था। उसकी हाज़िर जवाबी से राजा बहुत प्रसन्न था। बंगाल के प्रिय भोजन हिलसा मछली का मौसम आया। जिसे देखो वह हिलसा की बात कर रहा था। राजा ने शर्त रखी जो बाज़ार से हिलसा ख़रीद कर दरबार तक लाएगा, की एक भी व्यक्ति उससे हिलसा की बात ना करे, उसे पुरस्कृत किया जाएगा। जो भी यह चुनौती स्वीकार करे उसके साथ राजा के गुप्तचर चलेंगे। विदूषक ने चुनौती लेली। 

उसने अपने कपड़े अस्त व्यस्त किए। चेहरे पर मिट्टी का लेप किया और बाल बिखेर लिए। गुप्तचरों के सामने ही उसने दो मछलियाँ ख़रीदी और दुखी चेहरा बना कर चल पड़ा। सारा बाज़ार उसकी दशा देख हैरान रह गया। लोग मछली भूल अटकलें लगाने लगे की शायद राजा ने  क्रुद्ध हो उसे दरबार से निकाल दिया। एक भी व्यक्ति ने मछली की बात नहीं की और विदूषक दरबार तक पहुँच प्रतियोगिता जीत गया। 

मैंने सोचा उसने मछली से ध्यान हटाया तो हम भी आँख पर ध्यान खींचेंगे। साँझ ढली तो नंदिनी के साथ एक आँख पर डाक्टरी पट्टी बाँध कर घर से निकले। अपनी बिल्डिंग से बाहर आए ही थे की एक पड़ोसन मिली। "अरे भाई! किससे आँख लड़ गयी?""बस थोड़ी चोट लग गयी थी इसलिए बांधी है।" मैंने सफ़ाई दी। नंदिनी ने अपनी सूची में पहला मुहावरा लिखा। चलते चलते मैंने उसे मतलब भी समझाया।

अगले मोड़ पर सुना, "किससे आँख मटक्का कर आयी?" नंदिनी ने फटाफट अगला मुहावरा लिखा। अगली सहेली ने चुटकी ली, "कौन आँख में किरकिरी की तरह अटक गया?" हमने भी फ़ौरन जवाब दिया, "वही जो फूटी आँख नहीं सुहाता।"मेरी सहेली आशय भाँप कर खिलखिला कर हँसने लगी। इतने में दूसरी आ गयी और बोली, " ऐरी आँख किसने मारी?" नंदिनी की मुस्कान बढ़ती ही जा रही थी। कटाक्ष व्यंग में आँख निशाने पर थी।

सहेलियों के प्यार भरे ताने ख़त्म ही नहीं होते थे। दूर से एक और आवाज़ लगा कर बोली, "घर वालों की परेशानियों से तंग आकर आँख पर पट्टी बाँध ली क्या? अच्छा किया।" हम सभी हँस पड़े। फिर तो आँख के मुहावरों की चर्चा ही चल पड़ी। आँख मिलना, आँख दिखाना, आँख मींचना, आँख तरेरना, आँख का तारा, आँख से काजल चुराना, आँख में धूल झोंकना, आँख मींच कर विश्वास करना। अब तो नंदिनी ठहाके लगा के हँस पड़ी। उसकी लिस्ट भर चुकी थी।

घर लौटते हुए वह बोल ही पड़ी। माँ मुझे नहीं पता था की लोग इतना अधिक मुहावरो का इस्तेमाल करते हैं। मुहावरा भाषा को कितना रसीला और रोचक बनते हैं। अब घर चल के मैं इन्हें कापी में ही नहीं एक पोस्टर पर भी लिखूँगी। मैं मन ही मन संतुष्ट थी। थोड़ा तमाशा तो लगाया पर हँसते-खेलते अपनी बच्ची को अपनी बात समझा पायी। काश स्कूल में विज्ञान के साथ साथ भाषा की भी प्रयोगशाला होती। हमारे जीवन से लुप्त होती हिंदी की सरसता बचा पाते। 

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day