पापा की कहानी और हिलता दाँत
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|   Jun 01, 2017
पापा की कहानी और हिलता दाँत

कहते हैं, दाँत आते भी दुःख देते हैं और जाते भी। जो दाँत छःमहीने पर बच्चों को रुला-रुलाकर आते हैं, जल्दी ही गिर भी जाते हैं।

मैं पाँच-छः वर्ष की रही हूँगी। मेरे दूध के दाँत एक-एक करके हिलते और गिर जाते। कभी मुँह में बाँयी ओर का दाँत ग़ायब होता, कभी दाँयी ओर का। दो दिन जब दाँत गिरने से पहले हिलता, मैं घर सिर पर उठा लेती। 'दुःख गया' कह कर खाना छोड़ देती। मम्मी काफ़ी परेशान थी।

एक दिन कोने का कीला हिलने लगा। इसे अंग्रेज़ी में Canine कहते हैं। यह नुकीला होता है और खाने को छेदने के काम आता है। इस बार तो यह अपनी जगह से उखड़ ही नहीं रहा था। हिलता तो दर्द की लहर दौड़ जाती। मेरा खाना फिर कम हो गया। हर आने जाने वाले को मैं अपना दाँत दिखाती और उसकी सहानुभूति बटोर लेती। किसी को ज़बरन दाँत खींच कर निकालना तो दूर, मैं हाथ भी लगाने नहीं देती थी। मम्मी इस झंझट से तंग आ गयी और उन्होंने पापा से गुहार लगायी। कुछ करो प्लीज़।

पापा बहुत ही मस्त और ज़िंदादिल क़िस्म के इंसान रहे हैं। हर मुश्किल को अनोखे ही तरीक़े से सुलझाते हैं। उन्होंने मुझे पास बुलाया। मैं गाल थामे चली गयी और गोद में बैठ गयी। दाँत की बात करे बिना, उन्होंने पूछा कि क्या कहानी सुनोगी?

मैने बड़ी ज़ोर से सर हिल कर हामी भर दी। उन्होंने एक शर्त रखी की जब तक कहानी चलेगी, वे मेरा हिलता दाँत रोक कर रखेंगे। कहानी के लालच में, मैं मान गयी। एक साफ़ रुमाल से दाँत पकड़ कर पापा ने कहानी शुरू की।

एक बार एक साधू महाराज थे। वे घने जंगल में तपस्या करते थे। साधू महाराज को बीमार लोगों को ठीक करना आता था। (मैं अपना मुँह खोले सुन रही थी। पापा ने हिलता दाँत रुमाल से पकड़ रखा था।)

साधू महाराज किसी से धन नहीं माँगते थे। जो ठीक होता वो अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य से जो चाहता दे जाता। किसान अनाज दे जाते। गवाला दूध दही दे जाता। माली फल सब्ज़ी पहुँचा देते। साधू महाराज का गुजारा हो जाता।

एक दिन एक चिड़ीमार वहाँ आया। उसके पेट में दर्द था। उसके कंधे पर एक लम्बा बाँस था, जिस पर बहुत सारे पिंजरे थे। उन पिंजरों में तरह तरह के पक्षी थे। मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गयीं। पापा ने अब भी दाँत पकड़ रखा था पर मेरा ध्यान दाँत से ज़्यादा कहानी पर था।

साधू महाराज ने चिड़ीमार को एक पुड़िया दी और पानी के साथ खाने को कहा। चिड़ीमार ने कहा मान कर पुडिया खा ली। उसके पेट का दर्द ठीक हो गया। उसने ख़ुश होकर एक तोते का पिंजरा साधू महाराज को भेंट कर दिया। मेरी आँखें फैल कर कटोरे बराबर थी। साधू महाराज बोले की मैं इसका क्या करूँगा। चिड़ीमार ने कहा कि वह यही दे सकता था।

साधू महाराज ने कहा ठीक है अब यह तोता मेरा है, मैं इसका कुछ भी करूँ। यह कह कर उन्होंने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। तोता पिंजरे से निकल और साँए से उड़ कर दूर पेड़ की डाल पर जा बैठा।

यह कह कर पापा ने अपना हाथ घुमाया मैं हक्की-बक्की उनका रुमाल वाला तोता उड़ते देख रही थी। मुझे अनुमान भी नहीं था की मेरा दाँत भी तोते के साथ उधर जा चुका है। पापा ने मुस्कुराते हुए मम्मी को इशारा किया। उन्होंने झट से ढेर सारा बूरा मेरे मुँह में भर दिया। दाँत का काम हो गया था।

कई सालों तक मित्रों और रिश्तेदारों को यह क़िस्सा चटखारे ले कर सुनाया जाता था। मुझे कभी समझ नहीं आता था कि मेरे माँ-बाप, एक पाँच छः साल के मासूम बच्चे को ऐसे बेवक़ूफ़ कैसे बना सकते थे।

जब माँ बनने के बाद सिर पर पड़ी, तो समझ आया की हिलते दाँत वाले बच्चे को चुप करने को कोई कितनी भी हद तक जा सकता है। फिर मैंने भी अपने तीनों बच्चों के बहुत तोते उड़ाए और पापा की तरकीब का मन ही मन शुक्र किया।

साधू महाराज की तरह इस नुस्ख़े का भी कोई शुल्क नहीं आपके या आपके निकट जनों के काम आए तो ज़रूर आज़माएँ।

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