बिंदी... एक लघु कथा
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|   Feb 23, 2017
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बिंदी... एक लघु कथा

बहुत पसंद था उसे बिंदी लगाना। रूप रंग भी ग़ज़ब का था उसका। लाल रंग गोरे तन पर ऐसा फब्ता था मानो नयी सुबह में सूरज के आग़ाज़ की लालिमा बिखर गयी हो। उसके घने लंबे बाल तो मानो घमंड थे उसका।

बाबू जी का अभिमान थी वो, माँ की खोयी हुई पहचान थी। जितनी सुंदर उतनी ही सुशील और समझदार भी।

पूरे गाँव में वही एक लड़की थी जो स्नातक हो।

बाबू जी ने लड़का भी अफ़सर ढूँढा था उसके लिये। दान दहेज़ में भी कोई कमी ना छोडी़ थी। और शादी तो ऐसे ठाटबाट से की थी कि क्या कहने। और करते भी क्यों ना, एक ही तो लड़की थी उनकी।

माँ बाबू जी की लाड़ली विदा हो गयी। आँखों में आँसू थे पर दिल में हज़ारों सपने लिये, सबका स्नेह और आशीष साथ लिये वह चली अपना नया संसार बसाने।

नये घर में भी सबक़ी चहेती बन गयी थी वो। नयी बहू के गुणगान पूरे मोहल्ले में होते थे। अपनी बहू की तारीफ़ सुनकर शर्मा जी और उनकी पत्नी गर्व से फूले न समाते थे।

पर यह किसकी नज़र लगी, क़िस्मत की कैसी मार पड़ी। छ: महीने की नव विवाहिता आज विधवा हो गयी। चारों ओर ये कैसा शोर था। आज सभी का एक ही स्वर था। कल तक जो सबका नाज़ थी आज वो घर का शृाप हो गयी।

आज़ तेरह दिन हो गये उसे विधवा हुये। इन तेरह दिनों में सब छिन गया उससे। उसका हमसफर, उसका मान सम्मान, उसका शृँगार, उसके घने बाल, उसका लाल रंग, उसकी चूड़ियाँ,यहाँ तक की उसकी लाल बिंदी।

बचा था तो बस यह जीवन जो ठीक से शुरू भी ना हुआ और उजड़ गया।

अपना घर छोड़ कर नया घर बसाने आयी थी। ना तो नया घर अपना हुआ और ना ही पुराना वापिस मिला।

मिला तो बस तिरस्कार। परायों से तो कैसा शिकवा जब अपनों ने ही मौन साध लिया।

आज उसकी सूनी आँखें सबसे सवाल करतीं हैं। ऊपर वाले ने तो सिर्फ़ मेरा जीवन साथी छीना पर मेरी बिंदी, मेरा शृँगार, मेरा लाल रंग और मेरा अभिमान छीनने वाले तुम कौन? अपने जीवन साथी के जाने के बाद, ज़िंदा तो मैं बस नाम को ही थी पर मुझे मारने वाले तुम कौन?

अगर आपके पास उसके सवालों के जवाब हों तो ज़रूर दीजियेगा। शायद किसी और का जीवन बेरंग होने से बच जाये।

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