माँ से कैसी नाराज़गी?
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|   May 05, 2017
माँ से कैसी नाराज़गी?

#momspiration

रितु अपने भाई की शादी के दो दिन बाद ही अपने ससुराल वापिस आ गयी। यूँ तो उसका रेज़र्वेशन एक हफ़्ते बाद का था पर माँ के व्यवहार से दुखी हो वो जल्दी ही वापिस आ गयी।

रितु बहुत दुखी थी। सासु माँ से तो प्यार मिलने की कोई उम्मीद थी ही नहीं और अब माँ ने भी पराया कर दिया।

आँसु थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे।

राजीव ने जानने की बहुत कोशिश की पर रितु ने उसको कुछ नहीं बताया।

सासु माँ और नन्द दोनों हैरान थे पर रितु से किसी ने कुछ ना पूछा।

अगले दिन सुबह राजीव के ऑफ़िस जाते ही रितु ने अपना कमरा बंद कर लिया। रह रह कर उसको अपनी माँ का व्यवहार याद आ रहा था। एक बार भी उन्होंने नहीं सोचा की मुझको कितना बुरा लगेगा।

भाभी के मायाके से आई हुई साड़ी रितु को बिलकुल पसंद नहीं आयी थी।तो क्या वो ये बात अपनी भाभी को नहीं बोल सकती थी? क्या हो जाता अगर वो सिर्फ़ एक साड़ी अपनी पसंद से भाभी के सूट्केस से ले लेती तो?

इतनी सी बात पर उसकी माँ ने बिना उसकी भावनाओं की परवाह किए हुए भाभी के सामने ही उसको चुप करा दिया। भाभी के सामने हुआ अपना इस तरह अपमान रितु भूल ही नही पा रही थी।

उसकी सासु माँ ने दरवाज़ा खटखटाया तो रितु ने दरवाज़ा खोल कर तबियत ख़राब होने का बहाना बना दिया और फिर पलंग पर आ कर लेट गयी।

उसने इन बातों से अपना ध्यान हटाने के लिए लैप्टॉप उठाया और उस पर काम करने की कोशिश करने लगी। जैसे ही उसने ई-मेल खोला तो भाई का एक मेल था। वह उसको देख कर चौंक गयी।

उसने झट मेल खोला तो देखा कि ई-मेल भाई की id से था पर लिखा माँ ने था।

प्यारी रितु,

क्या माँ से इतनी नाराज़ हो कि मेरा फ़ोन भी नहीं उठाओगी? पहली बार कम्प्यूटर के सामने बैठी हूँ। तुम फ़ोन नहीं उठा रहीं थी तो मुझे परेशान होता देख बहु ने सुझाव दिया की तुमको ई-मेल लिख दूँ। भैया से तुम्हारा ई-मेल id भी उसी ने लिया और उसी ने मुझे सिखाया की मैं अपने मन की बात हिंदी में इस कम्प्यूटर पर कैसे लिखूँ।

अब वो हमारा परिवार है। तुम्हारी जगह तो कभी नी ले सकती पर उसको उसकी जगह ना मिले तो क्या ये अन-उचित ना होगा?

तुमको याद है ना की जब तुम अपनी ससुराल गयीं थी और सबने पहले ही दिन तुमको मायाके से आए हुए तोहफ़े और कपड़ों के लिए ताने मारे थे तो तुम कितना रोयीं थी?

तुम्हें फ़ोन पर रोता सुन मेरा कलेजा मुँह को आ गया था। मन किया था इसी पल तुमको अपने पास वापिस बुला लूँ।

तुम्हारी भी नन्द को हमारे भेजे हुए कपड़े पसंद नहीं आए थे और उन्होंने और तुम्हारी सासु माँ ने जब तुमको इस बात की उलाहना दी थी तब क्या तुमको बुरा नहीं लगा था?

जिस परिस्थिति से हम गुज़र चुके हैं और उसका दर्द समझते हैं तो क्या ये सही होता की हम अनु को भी उसी दर्द से गुज़रता हुआ देखें?

अनु अभी हमारे परिवार का नया सदस्य है। समय के साथ मुझे पूरा यक़ीन है की वो तुम्हारी पसंद और नापसंद भी समझ जाएगी और फिर में तो हूँ ही ना तुमको जो चाइए तुम्हारी पसंद से तुमको मिलेगा। इस घर पर तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना तुम्हारे भाई भाभी का है।

अगर उस दिन मैं तुमको नहीं रोकती तो हो सकता था कि तुम नन्द भाभी का रिश्ता एक कड़वाहट से शुरू होता। रिश्तों की मधुरता बनी रहे इसलिए उस दिन तुमको रोकना ज़रूरी था।

तुम्हारे इस तरह अचानक चले जाने से अनु को भी बहुत बुरा लगा है।

उम्मीद करती हूँ कि अब तुम्हारी नाराज़गी थोड़ी कम हुई होगी।

जब मन करे तो फ़ोन करना।

ढेर सारा आशीर्वाद

तुम्हारी माँ

अपनी माँ का ई-मेल पढ़ कर रितु को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसे अपनी करनी का अब बहुत पछतावा होने लगा।

उसने फ़ोन तो किया पर माँ से पहले उसने भाभी से बात की। अपनी ग़लती को स्वीकार किया और जल्दी ही घर आने का वायदा भी किया। अनु और रितु को बातें करता देख माँ भी ख़ुश थी। आज एक छोटी सी पहल ने उन दोनों के रिश्ते को मज़बूत बना दिया था।

अगर आपकी कहानी भी रितु की कहानी से मिलती हुई है तो क्यूँ ना रिश्ते मज़बूत किए जाएँ। क्यूँ ना पहल आपकी तरफ़ से हो?

यक़ीन मानिए अगर आपका सम्बंध आपकी भाभी से मधुर है तो माँ के बाद भी मायका मायका ही रहता है।

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