सेल्फ़ी फ़ीवर
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|   Jun 23, 2017
सेल्फ़ी फ़ीवर

एक समय था जब किसी के पास कैमरा होना भी कोई आम बात ना थी। सबको अपना फ़ोटो निकलवाने के लिए फ़ोटोग्राफ़र के पास ही जाना पड़ता था। तीज-त्योहार या अन्य कोई भी ख़ास मौक़े पर लोग सहपरिवार सज सँवर कर फ़ोटो निकलवाने जाते थे। फ़ोटो भी हाथों हाथ नहीं मिलता था। दो तीन दिन के बाद की तारीख़ दे दी जाती थी फ़ोटो ले कर जाने के लिए और सबको फ़ोटो का बेसब्री से इन्तज़ार रहता था।

धीरे धीरे समय बदला और लोगों के पास घर पर ही अपना ख़ुद का कैमरा रहने लगा। पर अब भी फ़ोटो किसी ख़ास मौक़े पर ही खिंचवाए और खींचे जाते थे। तब कोडैक मोमेंट्स घर पर ही लोग अपने अपने कैमरा में क़ैद करने लगे। तब भी फ़ोटो तुरंत ही नहीं मिलते थे। जब तक की कैमरा की रोल ख़त्म ना हो और वो धुल कर ना आ जाए तब तक फ़ोटो का सबको बेसब्री से इन्तज़ार रहता था। आजकल की तरह उस समय फ़ोटो लेने के लिए रीटेक का मौक़ा नहीं मिलता था। फ़ोटो कैसा आया है यह उसी वक़्त पता चलता था जब कैमरा रोल धुल कर आ जाए। अब चाहें आँखें बंद आयी हों या मुँह खुला फ़ोटो में जो एक बार क़ैद हो गया तो उसे सही करने का कोई उपाय नहीं हुआ करता था। जो पल एक बार कैमरा में क़ैद हुए वह फिर फूजिफ़िल्म की अल्बम में ही मिला करते थे।

समय और बीता और नए समय के साथ नयी टेक्नॉलजी ने दस्तक दी। उस दस्तक के साथ आगमन हुआ कैमरा वाले मोबाइल फ़ोन का।

पर तब भी मोबाइल में सिर्फ़ पीछे ही कैमरा हुआ करता था और पिक्चर क्वालिटी भी बहुत अच्छी नहीं हुआ करती थी।

तब तक लोग सेल्फ़ी शब्द और सेल्फ़ी लेने के ज्ञान से अनजान थे।

समय के साथ टेक्नॉलजी और भी तेज़ रफ़्तार से बदली और आज कैमरा वाले मोबाइल हर वर्ग हर परिवार के पास है।

मोबाइल में फ़्रंट कैमरा के साथ इजात हुआ नया बुखार- सेल्फ़ी फ़ीवर।

आज अस्सी प्रतिशत लोग इस फ़ीवर के शिकार हैं।

सोशल मीडिया और सेल्फ़ी लेने का बढ़ता क्रेज़, इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए बच्चे और युवा वर्ग।

सेल्फ़ी लेने का क्रेज़ अपनी हर सीमा लाँघ चुका है। दुनिया भर में सेल्फ़ी लेते वक़्त हो रही दुर्घटनाओं में हर साल हो रहा है इज़ाफ़ा।

भारत में भी ऐसी दुर्घटनाओं की ख़बर आए दिन अख़बारों और न्यूज़ चैनल्ज़ पर पढ़ी व सुनायी जाती हैं। हम भी ऐसी ख़बरें पढ़ सुन कर क्षणिक भर दुःख महसूस कर अपनी नित्य दिनचर्या में व्यस्त हो जाते हैं।

मुंबई शहर में अरब सागर के साथ अपनी सेल्फ़ी लेते हुए दो लड़कियों ने अपनी जान गँवाई हो या किसी लड़के ने भरी रिवाल्वर को अपनी कनपटी पर रखकर सेल्फ़ी लेते समय रिवाल्वर दबायी हो; क्या आपको नहीं लगता की इन हादसों के ज़िम्मेदार ये बच्चे अकेले नहीं हैं?

एक और ख़बर ने मुझ पर बहुत ही गहरा असर छोड़ा जब एक बच्चे ने अपने मृत दादा जी के पार्थिव देह के साथ अपनी सेल्फ़ी ली और अपने दादा जी को अंतिम विदाई देते हुए उसने ये सेल्फ़ी सोशल मीडिया पर पोस्ट की और लिखा “will miss you dada ji”

इस तरह की हरकत को क्या आप एक बीमारी का नाम नहीं देंगे? कौन है इसका ज़िम्मेदार?

इस बीमारी का शिकार सिर्फ़ बच्चे ही नहीं हैं इसका नमूना तब देखने को मिलता है जब लोग सेल्फ़ी लेने के लिए वक़्त की नज़ाकत की परवाह भी नहीं करते।

नए साल का जश्न मानते वक़्त दुबई के मशहूर होटेल बुर्ज ख़लीफ़ा में लगी आग और उसने फँसे हज़ारों लोगों के साथ एक लड़की ने अपनी सेल्फ़ी ली और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड भी किया। क्या हम वाक़ई इतने असंवेदनशील हो गए हैं?

ना ही फ़ोटो ल���ना ग़लत है ना ही सोशल मीडिया पर पोस्ट करना पर यह सब तभी अच्छा लगता है जब तक की हम अपनी और दूसरों की सुरक्षा और भावनाओं को ध्यान में रख कर ऐसा करें। बच्चे वही करते हैं जो वह अपने आस पास होता देखते हैं। अपने बच्चों को सेल्फ़ी फ़ीवर से बचा कर रखें।

दुर्घटना से बचें और सावधानी बरतें।

कल कहीं ऐसा ना हो की बच्चों की भावना सिर्फ़ सोशल मीडिया तक ही सीमित हो कर रह जाए। उनको वक़्त दे और वक़्त वक़्त पर उनका उचित मार्ग दर्शन करें। तभी हम उनके और अपने भविष्य को बेहतर बना पाएँगे।

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