पैरेंटिंग मंत्रा
19902
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|   Jun 18, 2017
पैरेंटिंग मंत्रा

बदलते वक्त के साथ पेरेंटिंग मे बहुत कुछ बदल गया है एकदम नया कोर्स आ गया है , कई नए सारे नियम आ गए मोबाइल आ गए TV आ गयी इंटरनेट आ गए बहुत कुछ बदला पैरेंट और बच्चों के रिश्ते के बीच।एक जगह जहां हमने बच्चों को ज्यादा छुट और सुविधा दी है वही दूसरी तरफ बच्चों में असंतुष्टि और अवसाद बढ़ा है ।आज न तो माँ बाप खुश है और न ही बच्चें, तो गलती कहाँ हो रही है ? इस सवाल का जवाब मैंने बहुत ढूंढा पर जवाब मिला मनुस्मृती की किताब के इस श्लोक से, गलती हो रही है समय को लेकर हम बच्चों के लिए कर तो सब रहे है पर गलत समय पर। लालयेत पंचवर्षाणि ,दस वर्षाणि ताडयेत।  प्राप्थे तु षोडशे वर्षे, पुत्रं मित्रवदाचरेत ।।

             

जन्म से पाँच वर्ष तक लाड़ , प्यार,अनुराग जितना देना है जरूर दीजिये ।अगले दस वर्ष यानी 6से 16 वर्ष उन पर नजर रखे ,और 16 वर्ष के बाद उससे मित्रवत व्यवहार रखे ।पर आजकल कर हम उल्टा रहे है पाँच साल तक हम प्यार अनुराग की जगह मित्रवत व्यवहार रख रहे है और 6 से 16 उम्र तक जब नजर रखना चाहिए तो हम उसे मोबाइल ,TV ,इंटरनेट ,कोचिंग के भरोसे छोड़ देते है ।16 वर्ष के बाद हम मित्रवत व्यहार की जगह उस पर नजर रखना चालू कर देते है मतलब सब कुछ सही करते है पर गलत समय पर। 0 से 5 वर्ष -शुरू के पाँच वर्ष में बच्चों के दिमाग का विकास 80 से 90% तक होता है बच्चा समाज दुनिया से ज्यादा संपर्क में भी नही रहता ,बच्चा आप पर आश्रित भी सबसे ज्यादा रहता है ,हाँ बस यही सही मौका है बच्चे को नैतिक मूल्य सीखने के ,प्रक्रति के संपर्क में लाने के अपना ढ़ेर सारा प्यार उड़ेलने का जो उसके जिंदगी भर चले ।पर इस उम्र में हम उसे ढ़ेर सारी पोएम ढेर सारा किताबी ज्ञान और हिंसा वाले मोबाइल गेम में डुबो देते है उसे तो मिट्टी पानी ,रेत से खेलने दे। उसे आइंस्टाइन या लता मंगेशकर सचिन बनाने की उम्र नही है ।इस उम्र में हम उसे उसके दिमाग के विकास के आधार के खिलौने दे अपना समय दे अपना सहारा दे जैसे हम सायकल सिखाते समय बच्चे को पूरा सहारा देते है हैंडिल भी पकड़े होते है उसका उत्साह भी बढ़ाते है उसे नियम सिखाते है दुनिया से परिचय कराते है।उसे शहर के भीड़ भरे माहौल मे नही चलाने देते ।यहाँ मेरा बच्चें को प्यार देने का कतई मतलब नही है कि उसकी अनर्गल माँगे पूरी करे । 5 से 16 वर्ष -5 से 16 वर्ष इन दस वषों मे बच्चे का समग्र विकास का समय है उसके चरित्र और उसके सोचने की शक्ति का विकास हो रहा है अब वो आप को और समाज को बडे गौर से देख समझ रहा है, और अपनी विचारधारा खुद के प्रति और समाज के प्रति बनाता जो जीवन भर उसके साथ रहती है यही सोच उसकी सुख ,दुख,संतुष्टि के पैमाने को तय करती है।यहाँ थोड़ा सहारा कम करने ,और थोड़ी छूट देने का समय है, थोड़ा हैंडिल छोड़ना है ,थोड़ा शहर के भीड़ भरे जगहों पर थोड़ा साथ देना है तो थोड़ा अकेले भी छोड़ना है l इस उम्र में बच्चों पर अपना प्रभाव डाले अपना दबाव नही।यही उम्र है जब थोड़ा गिरने दे थोड़ा सम्हलने दे अपने सारे अनुभव बच्चे को न दे कुछ उसे सीखने दे कि कैसे गिर के सम्हला जाता है और फिर कैसे आगे बढ़ा जाता है हारना और हर मानने में अंतर समझाए पर अब जरा दूर से क्योंकि आप का बच्चा अब बड़ा हो रहा है।अब हम सायकिल चलाने मे मदद करगे मगर उसके अंदर बिना सहारे के शहर में चलाने का विश्वास जगाना हमारा मुख्य उद्देश्य होगा । 16 उम्र के बाद - यदि आप ने 16 वर्ष तक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह किया है तो अब आप को एक दोस्त जिंदगी भर के लिए मिल गया है अब तो दोस्ती निभाने का मौका है । इसमे 16 से 26 साल सत्ता परिवर्तन का दौर है।अब हमारी भूमिका उस कोच है जिसका खिलाड़ी रेस में दौड़ रहा है अब उसके साथ नही दौड़ना है वरना या तो वो पीछे रह जायेगा या हमे बार ठोकर लगेगी ।इस रेस आप उत्साहवर्धन के लिए है।अब हमें धैर्यपूर्वक उसकी बातें सुनना है उसके लिए निर्णय न ले हाँ निर्णय लेने में मदद जरूर कर सकते है कभी माँ बाप हर छोटे से छोटे निर्णय मे अपनी मर्जी चलाते है इससे या तो बच्चा निर्णय की छमता कम हो जाती हैं या एक विद्रोह की भावना पनपती है।तुलना करना ,आदर्शवादी सोच भी टकराव का प्रमुख कारण बन जाते है ।यदिआपका बेटा या बेटी हर बात आँख बंद करके मान रहा है तो ये उतना सही नहीं है जितना एक सकारात्मक विचारविमर्श के बाद मान या न मान रहा है । अपने निर्णयों में भी उसकी मदद ले ।धीरे उसकी सहभगिता बढ़ाना जरूरी है ।

                     मै ये अच्छे से जानता हूं शब्दों को जोड़कर सलाह देना आसान है पर अपने बच्चे के क्रोध ,अवसाद,बुरी आदतों को झेलना और उसे सही दिशा देना सरल काम नही है ,किंतु आप को जिंदगी मे आसानी से कहाँ कुछ मिला है अच्छे और सफल बच्चे तो कदापि नही ।हम अपने व्यसाय मे अपनी नौकरियों में बहुत दिमाग,समय,श्रम लगाते है तो पेरेंटिंग को भी यू ही नही छोड़ सकते ।पेरेंटिंग मे कभी कभी हमे वो सब अपने बच्चों को वो आज़ादी देना पड़ती हैं जो बचपन में हमे कभी नही मिली या आज भी हम अपने माँ बाप से माँगने की हिम्मत नही कर पाते और हम भी अपने बच्चें को वो सब बनाना चाहते जो हम कभी सपने में भी नही बन सके । यह एक प्रकार का दीर्घकालिक निवेश जिसके जिंदगी भर रिटर्न्स मिलते रहेंगें और अंत में आप सभी को शुभकामनाएं देता हूँ और उम्मीद करता हूं मेरा ब्लॉग जिस तरह से मुझे पेरेंटिंग में मदद करता है शायद आप की भी कुछ मदद कर सके ।

                                                धन्यवाद

                               डॉ सुदीप वर्मा(पिता भी पुत्र भी)

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