अंतहीन...
32247
29
8
|   Mar 15, 2017
अंतहीन...

किसी शायर ने खूब लिखा है "न कोई वादा, न कोई दिलासा,न कोई उम्मीद, शाम आयी और  तेरा इंतज़ार करने लगे ।"

लक्ष्मी अपने मायके की आँगन की चिड़िया का रूप छोड़ इस घर की बहु बन गयी । समय और आगे चला और उसके गले के इर्द  गिर्द जो जोड़े छोटे छोटे हाथ गले के हार बन गए । शादी के तुरंत बाद ही वह दो बच्चों की माँ भी बन गयी। एक औरत जिसने कई रूपो को अपने अंदर बखूभी से समां लिया ।

पर शायद एक रूप की किसी ने कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी उस रूप को भी लक्ष्मी ने  बखूबी  निभाया । एक शक्तिशाली पिता का रूप, जो वह पिछले 25 सालों से निभा रही है । नौकरी की तलाश में पति अपने घर से निकले और शहर में जा बसे । ये उस समय की बात है जब चिठियां एक मात्रा सहारा थी जन परिजन तक पहुचने के लिए । छोटे जगहों पर टेलीफोन का इस्तेमाल कम हुआ करता था । शुरुआती दिनों में चिठियाँ आती जाती रही और फिर एक दिन यह क्रम भी बंद हो गया ।

 लक्ष्मी ने इसे पति व्यस्तता समझ और  इंतज़ार करने लगी उनके जवाब आने का । करीब 15 दिन बीत जाने के बाद उसने यह बात अपने परिवार वालों को बताई और लोग उन्हें  ढूंढने निकल पड़े । यहाँ दो बच्चों  के साथ उसका अकेला जीना मुहाल हो रहा था । दिन रात  सोच सोच कर उसकी नींद गायब थी  की उसके पति ठीक तो हैं ? कही बीमार तो नहीं? या नाराज़ हो गए क्या? 

काफी प्रयास के बाद भी उनके पति का कोई पता नहीं लग सका । इस पहाड़ से जीवन को वह अकेले कैसे काट सकेगी इस घबराहट ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था ।  उसी दौरान सूखे बंजर धरती पर एक फुहार सी आयी और लक्ष्मी ने रेलवे में क्लर्क का एग्जाम पास कर लिया था ।  पर शायद उनकी  राहें अभी भी इतनी आसान नहीं थी, सामाजिक लोक लाज के कारण  परम पूजनीय सास का आदेश आया की नौकरी नहीं करनी है और पति का इन्तेजार करने को कहा गया ।

साल भर बीत गया पर अभी तक उनके पति की कोई खबर नहीं आयी ।  उन्होंने अपने बच्चों के मासूम चेहरों को देखा और कुछ प्रण  लिया मन में ।महज 200 रूपये से उन्होंने स्कूल में पढना शुरू किया, साथ ही दिवंगत ससुर के पेंशन का सहारा था । जैसे तैसे ज़िन्दगी की गाडी बढ़ती चली गयी ।बड़े बेटे ने अपनी मेहनत से देश के नामी कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की । एक बड़ी कंपनी ने उसे स्कालरशिप दिया ताकि उसी पढाई में कोई रुकावट न हो । उनका छोटा लड़का भी बड़े भाई के नक़्शे कदम पर चलता हुआ मेहनत  कर रहा है। 

लक्ष्मी ने इतने सालों में अपने मांग का सिन्दूर कभी भी कम नहीं होने दिया । वो हर उन औरतों की  तरह रहती हैं जिनके पति हैं, वो सारे व्रत करती हैं जिससे उनके पति की लंबी उम्र हो, हर सावन मेहँदी लगाती हैं, हर तीज भूखे प्यासे रह कर उस इंसान के लिए कामना करती है जो उन्हें जीवन के इस मजधार में छोड़ कर कहीं  चला गया ।उन्होंने ये कभी नहीं माना की उनके पति इस दुनिया में नहीं ।

जो भी लक्ष्मी से मिलता है वह सिर्फ उसी हँसी और आँखों की चमक देखता है, जिसमे शुन्य के लिए कही जगह नहीं है । कई सोचते है इतनी भक्ति क्यों उस इंसान के लिए जिसने लक्ष्मी की कभी सुध नहीं ली । जब लक्ष्मी की सास गुजरी तो उन्हें  ये लगा था की शायद उनके पति अब लौट आये । ये आस फिर जगी जब बेटे का ब्याह हुआ  । अपने होने वाली बहु के लिए वह सब खुद ख़रीदा और किया जो उन्हें कभी नहीं मिला । कुछ दिनों पहले बेटे और बहु के साथ उन्होंने अपना पचासवाँ जन्मदिन मनाया । उनका हर कण मुस्कुरा रहा था और ये देख हर कोई वहाँ  खुश था ।

इतने संघष के बाद लक्ष्मी एक सुखद जीवन जी रही हैं। उन्हें अक्सर से ग़ज़ल गुनगुनाते सुना गया है - रंजिश ही सही, दिल ही दुखने के लिए आ... आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ .....  

आज की इस तेज लाइफ में जहाँ रिश्ते फेसबुक पर बन और बिगड़ रहे हैं, कोई ऐसा भी है जो बिना किसी शर्त के इस आस में जिए जा रहा है की कब वह घर लौट के आ जाएं  । 

लक्ष्मी की कहानी अंतहीन है कई मायनो में - अंतहीन संघर्ष उनके परिस्थितयों से,  अंतहीन मोह अपने पति के लिए और एक अंतहीन विश्वास उनके लौट आने का  । 

मैंने अपने एक परिचित के जीवन को आप सब के बीच प्रस्तुत किया है । भावनाओं को ध्यान में रखते हुए पात्र  का नाम बदल दिया गया है  । 

मेरी तरफ से  लक्ष्मी के लिए सिर्फ अंतहीन स्नेह छलकता है । 

Read More

This article was posted in the below categories. Follow them to read similar posts.
LEAVE A COMMENT
Enter Your Email Address to Receive our Most Popular Blog of the Day