मैं कमाती नहीं हूं, मैं कहां जाऊं?
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|   Apr 20, 2017
मैं कमाती नहीं हूं, मैं कहां जाऊं?

जीवन खुशियों की सेज नहीं है, पर क्या खुशियों की तलाश करना गलत है? हम शादी करते हैं, एक सुखी जीवन और एक अच्छे हमसफर का सपना लेकर। पर अगर यह सपना टूट जाए तो? क्या बस हार मानकर बैठ जाना ही एक रास्ता है? हमने जिस प्यार का सपना देखा था, अगर उसकी कीमत हमारा स्वाभिमान हो तो? हमें जीवन संघर्ष से डर नहीं, पर अगर इस संघर्ष में हमें सिर्फ अपमान मिले तो? क्या हमें एक भी प्रयास नहीं करना चाहिए अपनी सुखी जीवन के सपने को साकार करने का?

She took a step because she was financially independent and moved on. पर मैं तो कमाती नहीं हूं, मैं कहां जाऊंगी?

यह वह वाक्य है, जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया।मैं भी वर्किंग नहीं हूं पर ईश्वर न करें अगर जिंदगी ने कभी इस मोड़ पर लाकर खड़ा किया तो मैं अपमानित होकर जीने से मर मर के आगे बढ़ना पसंद करूंगी। हर वह लड़की जिसको अपनी वर्किंग ना होने पर घुटन महसूस होती है, क्योंकि financially independent ना होने के कारण अपनी साथ हो रही किसी भी तरह की घरेलू हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाने का वह कभी साहस नहीं कर पाई है , उसकी हिम्मत को , यह एक छोटी सी पुकार है-

कभी सोचा है क्या ऐसे तुमने सखी,

जिस पिंजरे में तुम कैद हो, उसकी कूची(चाबी) तुम खुद तो नहीं?

दो हाथ दिए हैं, पांव दिए हैं

काम तुम्हारे आने को, ईश्वर ने तुम्हें दो नयन दिए हैं।

क्यों रुकी हुई हो अंधकार में,

क्यों फसी हुई हो इस मझदार में?

लज्जा रूपी वस्त्र , क्यों नयन तुम्हारे धरे रहे?

पायल के नूपुर क्यों बेढी तुम्हारी बने रहें?

सजाया था जो सिंदूर तुमने अपनी मांग में, वह खो दे अपना मान अगर

क्यों एक काली पोत की डोर से तुम बंधी रहो?

किस बात से हो डरी हुई?

है क्या जिसने तुमको रोका है?

जीवन का पथ कठिन सही, हमसफर भी क्या हुआ कि हम दर्द नहीं

तुम धीर बनो पर वीर बनो,

हो शीतल भले ही चित् तुम्हारा, पर ह्रदय में ज्वाला जलने दो।

तुम डटी रहो, तुम टिकी रहो

तुम झुको नहीं, तुम थको नहीं।

परिवार यज्ञ में क्यों तुम ही स्वाहा होती हो?

हो जिसके वामांग में बैठी हुई, क्यों उसके अहम को अपना स्वाभिमान भेंट चढ़ाती हो?

मान युद्ध का पहला बलिदान नहीं,

स्वालंबन के आंंदो​लन की मशाल बनो।

तुम चली चलो, तुम रुको नहीं

अपने पथ की तलाश तुम स्वयं करो।

क्यों खुद को बोझ समझती हो?

अपना भार तुम खुद ही वहन करो।

बांधों​ अपनी भावनाओं को अपने आत्म सम्मान की रेखा से,

देखो कोई इस रेखा को लज्जित ना करें,

फिर बनकर साधु कोई रावण तुम्हें ना ठगे।

तुम कुटिल नहीं, पर तीक्ष्ण बनो।

अपमान तुम्हारी नियति नहीं,

बस सहते जाना धर्म नहीं।

जननी हो तुम जीवन की, अपनी ही जीवन के मूल्य को इतना कम ना करो

है​ धन्य हुई हर वह नारी, जिसने स्वयं का मान किया है

मत अश्रु बहाओ अग्नि परीक्षा पर,

स्त्री के चरित्र को अपमानित कर, राम सा राजा भी कहां सुखी रहा है?

एक नए नजरिए से तुम रामायण देखो,

अंततः सीता ने ही राम का त्याग किया है।

अपने सम्मान को सर्वोपरि रखने का पाठ दिया है।

खुद को झूठे नारी धर्म से तुम मुक्त करो,

तुम कोमल हो, कमजोर नहीं

साहस करो, अपनी रक्षक तुम खुद ही बनो

मत राह तको  तुम ईश्वर की, वह स्वयं तुम्हारे अंदर है

सपनों को अश्रु में बहाने से पहले, उन्हें अपनी हिम्मत की कश्ती तो दो,

सब कुछ बस यूं ही हार जाने से पहले, कुछ दाव पर लगा कर देखो तो सही। मैं बस इतना ही कहना चाहती हूं, जीने की कीमत जीने की चाहत से बड़ी नहीं है। जीवन अनमोल है, इसे बस सहने और आंसू बहाने में व्यर्थ ना करें। अपने जीवन को भरपूर जिए और अपने बच्चों को भी आत्म सम्मान के साथ जीने का हुनर सिखाएं।

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