अपराधबोध-दंगल समीक्षा
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|   Feb 22, 2017
अपराधबोध-दंगल समीक्षा

हाल ही में प्रदर्शित चलचित्र “दंगल” ने सभी के दिलों को छुआ. उसमें से प्रमुख विषय था- लड़कियों का कुश्ती जैसे पुरुषप्रधान खेल में अपनी धाक जमाना. अगर आप गौर से इस चलचित्र की समीक्षा करें तो आपको एक जुझारू पिता की तड़प भी दिखाई देगी.माता पिता का हमारे जीवन में प्रमुख स्थान होना चाहिए परन्तु जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और सफलता की चरम सीमा पर पहुँच जाते हैं तब वे यह भूल जाते हैं कि उनका पहला कदम उठाने में माता पिता ने ही मदद की थी.

चलचित्र में महावीर सिंह अपनी पुत्रियों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर चयनित होने पर उसी पुत्री को अपने पिता द्वारा दिया गया प्रषिक्षण निरर्थक लगने लगता है. एक पिता का मन आहत हो जाता है परन्तु अपनी गलती का एहसास होने पर  जब पुत्री पिता से माफ़ी मांगती है तो कोमल हृदय वाला पिता बिटिया की गलती माफ़ कर देते हैं.हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज हम जहाँ पहुंचे हैं उसके पीछे हमारे माता पिता का संघर्ष है.हमें खुश रखने के लिए ना जाने वे कितनी रातें जागे होंगे.

जाने अनजाने अगर हमने किसी का दिल दुखाया है तो माफ़ी मांग ले क्योंकि अपराधबोध से ग्रसित व्यक्ति जीवन

में सफल नहीं हो पाता.

दूसरी तरफ कुश्ती जैसे खेल में लड़कियों का प्रवेश समाज को बिलकुल नहीं भाता.महावीर सिंह जी का मनोबल तोड़ने के लिए गाँव के लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं पर उनके दृढनिश्चय के सामने सभी लोगों को घुटने टेकने पड़ते हैं.आख़िरकार वे अपनी दोनों बेटियों को राष्टीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती में प्रवेश दिलवा देते हैं

इस चलचित्र द्वारा समाज का लड़कियों के प्रति नजरिया जरूर बदलेगा और लोग जागरूक हो कर भेदभाव को खत्म करने की कोशिश अवश्य करेंगे.अब समय आ गया है बदलाव का,क्यों ना शुरुवात अपने घर से करें.

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